भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति

दोहा ८१ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क) ॥

अर्थ

हे हरिजन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डों में फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को मैंने दूसरी तरह का नहीं देखा।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ८१ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा