श्रवनवंत अस को जग माहीं

चौपाई ३, दोहा ५३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥ ३ ॥

अर्थ

जगत् में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे जड़ जीव अपनी आत्मा की हत्या करनेवाले हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा