पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही
चौपाई ४, दोहा ६६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥ बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥ ४ ॥
अर्थ
फिर प्रभु ने गिद्ध जटायु की जिस प्रकार क्रिया की, कबन्ध का वध करके शबरी को परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी सरोवर के तीर पर गये, वह सब कहा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा