मोह न अंध कीन्ह केहि केही

चौपाई ४, दोहा ७० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥ तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥ ४ ॥

अर्थ

उनमें से भी किस-किसको मोह ने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया ? जगत् में ऐसा कौन है जिसे काम ने न नचाया हो ? तृष्णा ने किसको मतवाला नहीं बनाया ? क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया ?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा