नारदजी का आना और स्तुति करके ब्रह्मलोक को लौट जाना

देवर्षि नारद प्रभु के दर्शन करके उनकी महिमा का गान करते हैं। स्तुति पूर्ण कर वे ब्रह्मलोक को लौट जाते हैं।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण ११ / २१

प्रकरण पाठ

दोहा

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥ ५० ॥

अर्थ:

उसी अवसर पर नारद मुनि हाथ में वीणा लिये हुए आये। वे श्रीरामजी की सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कीर्ति गाने लगे।

दोहा 51 के अंतर्गत
चौपाई

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥ नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥ १ ॥

अर्थ:

कृपापूर्वक देख लेने मात्र से शोक के छुड़ानेवाले हे कमलनयन ! मेरी ओर देखिये (मुझपर भी कृपादृष्टि कीजिये)। हे हरि! आप नील कमल के समान श्यामवर्ण और कामदेव के शत्रु महादेवजी के हृदयकमल के मकरन्द (प्रेम-रस) के पान करनेवाले भ्रमर हैं।

चौपाई

जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥ भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥ २ ॥

अर्थ:

आप राक्षसों की सेना के बल को तोड़नेवाले हैं। मुनियों और संतजनों को आनन्द देनेवाले और पापों के नाश करनेवाले हैं। ब्राह्मणरूपी खेती के लिये आप नये मेघसमूह हैं और शरणहीनों को शरण देनेवाले तथा दीन जनों को अपने आश्रय में ग्रहण करनेवाले हैं।

चौपाई

भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥ रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥ ३ ॥

अर्थ:

अपने बाहुबल से पृथ्वी के बड़े भारी बोझ को नष्ट करनेवाले, खर-दूषण और विराध के वध करने में कुशल, रावण के शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओं में श्रेष्ठ और दशरथ के कुलरूपी कुमुदिनी के चन्द्रमा श्रीरामजी! आपकी जय हो।

चौपाई

सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥ कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥ ४ ॥

अर्थ:

आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदों में और तन्त्रादि शास्त्रों में प्रकट है। देवता, मुनि और संतों के समुदाय उसे गाते हैं। आप करुणा करनेवाले और झूठे मद का नाश करनेवाले, सब प्रकार से कुशल (निपुण) श्रीअयोध्याजी के भूषण ही हैं।

चौपाई

कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥ ५ ॥

अर्थ:

आपका नाम कलियुग के पापों को मथ डालनेवाला और ममता को मारनेवाला है। हे तुलसीदास के प्रभु! शरणागत की रक्षा कीजिये।

दोहा

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम। सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम॥ ५१ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूहों का प्रेमपूर्वक वर्णन करके मुनि नारदजी शोभाके समुद्र को हृदय में धरकर जहाँ ब्रह्मलोक है वहाँ चले गये।