एतना मन आनत खगराया

चौपाई १, दोहा ७८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥ १ ॥

अर्थ

हे पक्षिराज! मन में इतना लाते ही श्रीरघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवों की भाँति संसार में डालनेवाली हुई।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा