निज मति सरिस नाथ मैं गाई

चौपाई १, दोहा ९१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥ कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥ १ ॥

अर्थ

हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभु के प्रताप और महिमा का गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्ति से बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब अपनी आँखों देखी कही है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा