करउँ बिचार बहोरि बहोरी

चौपाई ४, दोहा ८२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥ ४ ॥

अर्थ

मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ी में देखा। मन में विशेष मोह होने से मैं भ्रमित हो गया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा