हरि बिषइक अस मोह बिहंगा

चौपाई ४, दोहा ७३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥ मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥ ४ ॥

अर्थ

हे गरुड़जी! श्रीहरि के विषयक इस मोह की कल्पना भी ऐसी ही है। भगवान् में तो स्वप्न में भी अज्ञान का प्रसंग नहीं है। किन्तु जो मायावश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदय पर अनेकों प्रकार के परदे पड़े हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा