मच्छर काहि कलंक न लावा
मच्छर काहि कलंक न लावा
चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥ चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥ २ ॥
अर्थ
मत्सर (डाह) ने किस को कलंक नहीं लगाया? शोक-रूपी पवन ने किसे नहीं डोलाया? चिन्ता-रूपी साँपिन ने किस को नहीं खाया? जगत में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा