अरुन पानि नख करज मनोहर
अरुन पानि नख करज मनोहर
चौपाई १, दोहा ७७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥ कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥ १ ॥
अर्थ
लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मन को हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओं पर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह के-से कंधे और शंख के समान (तीन रेखाओं से युक्त) ग्रीवा है। सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छवि की सीमा ही है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा