लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता

चौपाई १, दोहा ८१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥ १ ॥

अर्थ

प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, निशाचर, पशु, पक्षी, सर्प।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा