तुम्हहि न संसय मोह न माया
तुम्हहि न संसय मोह न माया
चौपाई २, दोहा ७० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया॥ पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥ २ ॥
अर्थ
आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझ पर दया की है। हे पक्षिराज! मोह के बहाने श्रीरघुनाथजी ने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा