जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई
चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआईं बिमोह मन करई॥ जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥ ३ ॥
अर्थ
जो ज्ञानियों के चित्त को भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मन में जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझ को भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा