धनद कोटि सत सम धनवाना

चौपाई ४, दोहा ९२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥ भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥ ४ ॥

अर्थ

वे अरबों कुबेरों के समान धनवान् और करोड़ों मायाओं के समान सृष्टि के खजाने हैं। बोझ उठाने में वे अरबों शेषों के समान हैं। [अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातों में] सीमारहित और उपमारहित हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा