सागर सरि सर बिपिन अपारा
सागर सरि सर बिपिन अपारा
चौपाई ४, दोहा ८० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥ ४ ॥
अर्थ
असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा