ताते उमा न मैं समुझावा
ताते उमा न मैं समुझावा
चौपाई ४, दोहा ६२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥ होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खोवै चह कृपानिधाना॥ ४ ॥
अर्थ
हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजी की कृपा से उसका मर्म (भेद) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा