बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई
चौपाई २, दोहा ७६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥ बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥ २ ॥
अर्थ
सुन्दर आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगन में विचर रहे हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा