बन उजारि रावनहि प्रबोधी

चौपाई ३, दोहा ६७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥ आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही की कुसल सुनाई॥ ३ ॥

अर्थ

अशोकवन को उजाड़कर, रावण को समझाकर, लंका पुरी को जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्र को लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजी की कुशल सुनायी।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा