कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई
चौपाई २, दोहा ५४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥ ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥ २ ॥
अर्थ
श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करता है। और करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है। जगत् में कोई विरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा