बारात का अयोध्या लौटना और अयोध्या में आनन्द

विवाह के उपरांत बारात नववधुओं सहित अयोध्या लौटती है। नगरवासी प्रेम और उल्लास से उनका स्वागत करते हैं, और अयोध्या आनंदमय हो उठती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५८ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥ भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥ १ ॥

अर्थ:

राजा दशरथजी ने विनती करके प्रतिष्ठित जनों को लौटाया और आदर के साथ सब माँगनेवालों को बुलवाया। उनको गहने-कपड़े, घोड़े-हाथी दिये और प्रेम से पुष्ट करके सबको सम्पन्न कर दिया।

चौपाई

बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥ बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

वे सब बारंबार विरुदावली (कुलकीर्ति) बखानकर और श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर लौटे। कोसलाधीश दशरथजी बार-बार लौटने को कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते।

चौपाई

पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥ राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥ ३ ॥

अर्थ:

दशरथजी ने फिर सुहावने वचन कहे--हे राजन् ! बहुत दूर आ गये, अब लौटिये। फिर राजा दशरथजी रथ से उतरकर खड़े हो गये। उनके नेत्रों में प्रेम का प्रवाह बढ़ आया (प्रेमाश्रुओं की धारा बह चली)।

चौपाई

तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥ करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥ ४ ॥

अर्थ:

तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेह रूपी अमृत में डुबोकर वचन बोले--मैं किस तरह बनाकर (किन शब्दों में) विनती करूँ। हे महाराज ! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है।

दोहा

कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥ ३४० ॥

अर्थ:

अयोध्यानाथ दशरथजी ने अपने स्वजन समधी का सब प्रकार से सम्मान किया। उनके आपस के मिलने में अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदय में समाती न थी।

दोहा 341 के अंतर्गत
चौपाई

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥ सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥ १ ॥

अर्थ:

जनकजी ने मुनिमण्डली को सिर नवाया और सभी से आशीर्वाद पाया। फिर आदर के साथ वे रूप, शील और गुणों के निधान सब भाइयों से--अपने दामादों से मिले।

चौपाई

जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥ राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥ २ ॥

अर्थ:

और सुन्दर कमल के समान हाथों को जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेम से ही जन्मे हों। हे रामजी ! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ ! आप मुनियों और महेशजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस हैं।

चौपाई

करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥ ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥ ३ ॥

अर्थ:

योगी लोग जिनके लिये योग करते हैं, जो मोह, ममता, मदु त्यागी हैं, वे व्यापक ब्रह्म, अलख, अविनाशी, चिदानंदु, निर्गुण, गुणरासी हैं।

चौपाई

मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥ महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनको मन सहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमा को वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालों में एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं।

दोहा

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥ ३४१ ॥

अर्थ:

वे ही समस्त सुखों के मूल [आप] मेरे नेत्रों के विषय हुए। ईश्वर के अनुकूल होने पर जगत में जीव को सब लाभ ही लाभ है।

दोहा 342 के अंतर्गत
चौपाई

सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥ होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥ १ ॥

अर्थ:

आपने मुझे सभी प्रकार से बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। यदि दस सहस्र सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पों भर गणना करें।

चौपाई

मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥ मैं कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥ २ ॥

अर्थ:

तो भी हे रघुनाथजी ! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणों की कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती। मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह अपने इस एक ही बल पर कि आप अत्यन्त थोड़े स्नेह से प्रसन्न हो जाते हैं।

चौपाई

बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥ सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े। जनकजी के श्रेष्ठ वचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए।

चौपाई

करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥ बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्ठजी के समान जानकर ससुर जनकजी का सम्मान किया। फिर जनकजी ने भरतजी से विनती की और प्रेम के साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया।

दोहा

मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस। भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस॥ ३४२ ॥

अर्थ:

फिर राजा ने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी से मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया। वे परस्पर प्रेम के वश होकर बार-बार आपस में सिर नवाने लगे।

दोहा 343 के अंतर्गत
चौपाई

बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥ जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥ १ ॥

अर्थ:

जनकजी ने बार-बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाइयों के साथ चले। जनकजी ने जाकर विश्वामित्रजी के चरण पकड़ लिये और उनके चरणों की रज सिर और नेत्रों में लगाई।

चौपाई

सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥ जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

[उन्होंने कहा—] हे मुनीश्वर! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में ऐसा विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपति चाहते हैं; परन्तु [असंभव समझकर] जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं।

चौपाई

सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥ कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियाँ आपके दर्शन की अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलने वाली हैं। इस प्रकार बार-बार विनती की और सिर नवाकर तथा आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे।

चौपाई

चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥ रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥ ४ ॥

अर्थ:

डंका बजाकर बारात चली। छोटे-बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं। गाँवों के स्त्री-पुरुष श्रीरामचन्द्रजी को देखकर नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं।

दोहा

बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत। अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत॥ ३४३ ॥

अर्थ:

बीच-बीच में सुंदर मुकाम करती हुई तथा मार्ग के लोगों को सुख देती हुई वह बारात पवित्र दिन में अवध के समीप आ पहुँची।

दोहा 344 के अंतर्गत
चौपाई

हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥ झाँझि बिरव डिंडिमी सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥ १ ॥

अर्थ:

नगाड़ों पर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढोल बजने लगे। भेरी और शंख की ध्वनि हो रही है; हाथी-घोड़े गरज रहे हैं। विशेष शब्द करने वाली झाँझें, सुहावनी डिंडिमियाँ तथा रसीले राग से शहनाइयाँ बज रही हैं।

चौपाई

पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥ निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥ २ ॥

अर्थ:

बारात को आती हुई सुनकर नगर निवासी प्रसन्न हो गये। सब के शरीरों पर पुलकावली छा गयी। सब ने अपने-अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगर के द्वारों को सजाया।

चौपाई

गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं। जहँ तहँ चौकें चारु पुराईं॥ बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥ ३ ॥

अर्थ:

सारी गलियाँ अरगजे से सिंचाई गईं, जहाँ-तहाँ सुन्दर चौक पुराये गये। तोरणों, केतुओं, पताकाओं और वितानों से बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥ लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥ ४ ॥

अर्थ:

फलसहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमाल के वृक्ष लगाये गये। वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष [फलों के भार से] पृथ्वी को छू रहे हैं। उनके मणियों के थाले बड़ी सुन्दर कारीगरी से बनाये गये हैं।

दोहा

बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥ ३४४ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के मंगल-कलश घर-घर सजाकर रखे गये हैं। श्रीरघुनाथजी की पुरी (अयोध्या) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं।

दोहा 345 के अंतर्गत
चौपाई

भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥ मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥ १ ॥

अर्थ:

उस समय राजमहल अत्यन्त शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेव का भी मन मोहित हो जाता था। मंगल शकुन, मनोहरता, ऋद्धि-सिद्धि, सुख और सुहावनी सम्पदा वहाँ शोभा पा रही थीं।

चौपाई

जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए॥ देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥ २ ॥

अर्थ:

और सब प्रकार के उत्साह (आनन्द) मानो सहज सुन्दर शरीर धर-धरकर दशरथजी के घर में छा गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के दर्शन के लिये भला कहिये, किसे लालसा न होगी?

चौपाई

जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि॥ सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥ ३ ॥

अर्थ:

सुहागिनी स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छवि से कामदेव की स्त्रियों को भी निरादर कर रही हैं। सभी सुन्दर मंगल-द्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हैं, मानो सरस्वतीजी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों।

चौपाई

भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥ कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेमबिबस तन दसा बिसारीं॥ ४ ॥

अर्थ:

राजमहल में [आनन्द के मारे] शोर मच रहा है। उस समय का और सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजी की सब माताएँ प्रेम के वश होने से शरीर की सुध भूल गयीं।

दोहा

दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि। प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥ ३४५ ॥

अर्थ:

गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजी का पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत-सा दान दिया। वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो।

दोहा 346 के अंतर्गत
चौपाई

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥ राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥ १ ॥

अर्थ:

सुख और महान् आनन्द से विवश होने के कारण सब माताओं के शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये वे अत्यन्त अनुराग में भरकर परिछन का सब सामान सजाने लगीं।

चौपाई

बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥ हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥ २ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के बाजे बजते थे। सुमित्राजी ने आनन्दपूर्वक मंगल-साज सजाये। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मंगल-मूल वस्तुएँ।

चौपाई

अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥ छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥ ३ ॥

अर्थ:

तथा अक्षत (चावल), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसी की सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं। नाना रंगों से चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्ण के कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेव के पक्षियों ने घोंसले बनाये हों।

चौपाई

सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥ रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥ ४ ॥

अर्थ:

शकुन की सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जा सकतीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मंगल-साज सजा रही हैं। बहुत प्रकार की आरतियाँ बनाकर वे आनन्दित होकर सुन्दर मंगल-गान कर रही हैं।

दोहा

कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥ ३४६ ॥

अर्थ:

सोने के थालों को मंगल-सामग्रियों से भरकर अपने कमल के समान (कोमल) हाथों में लिये हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावली से छा गये हैं।

दोहा 347 के अंतर्गत
चौपाई

धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥ सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँबलाक अवलि मनु करषहिं॥ १ ॥

अर्थ:

धूप के धुएँ से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़-घुमड़कर छा गये हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलों की पंक्ति मन को अपनी ओर खींच रही हो।

चौपाई

मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥ प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों। अटारियों पर सुन्दर और चपल स्त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं (आती-जाती हैं); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजली चमक रही हो।

चौपाई

दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥ सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

नगाड़ों की ध्वनि मानो बादलों की घोर गर्जना है। याचकगण पपीहे, मेढक और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो रहे हैं।

चौपाई

समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥ सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥ ४ ॥

अर्थ:

[प्रवेश का] समय जानकर गुरु वसिष्ठजी ने आज्ञा दी। तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजी ने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजी का स्मरण करके समाज सहित आनन्दित होकर नगर में प्रवेश किया।

दोहा

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ। बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥ ३४७ ॥

अर्थ:

शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा-बजाकर फूल बरसा रहे हैं। देवताओं की स्त्रियाँ आनन्दित होकर सुन्दर मंगल-गीत गा-गाकर नाच रही हैं।

दोहा 348 के अंतर्गत
चौपाई

मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥ जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥ १ ॥

अर्थ:

मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों को उजागर (सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाशस्वरूप) श्रीरामचन्द्रजी का यश गा रहे हैं। जयध्वनि तथा वेद की निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मंगल से सनी हुई दसों दिशाओं में सुनाई पड़ रही है।

चौपाई

बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥ बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

बहुत-से बाजे बजने लगे। आकाश में देवता और नगर के लोग सब प्रेम में मग्न हैं। बराती ऐसे बने-ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। परम आनन्दित हैं, सुख उनके मन में समाता नहीं है।

चौपाई

पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥ करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब अयोध्यावासियों ने राजा को जोहार (वन्दना) की। श्रीरामचन्द्रजी को देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियाँ और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं।

चौपाई

आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी॥ सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥ ४ ॥

अर्थ:

नगर की स्त्रियाँ आनन्दित होकर आरती कर रही हैं और सुन्दर चारों कुमारों को देखकर हर्षित हो रही हैं। पालकियों के सुन्दर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनों को देखकर सुखी होती हैं।

दोहा

एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥ ३४८ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वार पर आये। माताएँ आनन्दित होकर बहुओं समेत कुमारों का परछन कर रही हैं।

दोहा 349 के अंतर्गत
चौपाई

करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥ भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥ १ ॥

अर्थ:

वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान् आनन्द को कौन कह सकता है! अनेक प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकार की अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं।

चौपाई

बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥ पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥ २ ॥

अर्थ:

बहुओं समेत चारों पुत्रों को देखकर माताएँ परमानन्द में मग्न हो गयीं। सीताजी और श्रीरामजी की छबि को बार-बार देखकर वे जगत् में अपने जीवन को सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं।

चौपाई

सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥ बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥ ३ ॥

अर्थ:

सखियाँ सीताजी के मुख को बार-बार देखकर अपने पुण्यों की सराहना करती हुई गान कर रही हैं। देवता क्षण-क्षण में फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पित करते हैं।

चौपाई

देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥ देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥ ४ ॥

अर्थ:

चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाओं को खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि वे उन्हें सभी बिल्कुल तुच्छ जान पड़ीं। तब हारकर वे भी श्रीरामजी के रूप में अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं।

दोहा

निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत। बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥ ३४९ ॥

अर्थ:

वेद की विधि और कुल की रीति करके अर्घ्य-पाँवड़े देते हुए बहुओं समेत सब पुत्रों को परछन करके माताएँ महल में लिवा चलीं।

दोहा 350 के अंतर्गत
चौपाई

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥ तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥ १ ॥

अर्थ:

स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने ही अपने हाथ से बनाये थे। उन पर माताओं ने राजकुमारियों और राजकुमारों को बैठाया और आदर के साथ उनके पवित्र चरण धोये।

चौपाई

धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥ बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥ २ ॥

अर्थ:

फिर वेद की विधि के अनुसार मंगलनिधि दूलह और दुलहिनों की धूप, दीप और नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा की। माताएँ बारंबार आरती कर रही हैं और वर-वधुओं के सिरों पर सुन्दर पंखे तथा चँवर ढल रहे हैं।

चौपाई

बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥ पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेकों वस्तुएँ निछावर हो रही हैं; सभी माताएँ आनन्द से भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगी ने परम तत्त्व को प्राप्त कर लिया। सदा के रोगी ने मानो अमृत पा लिया।

चौपाई

जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥ मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जन्म का दरिद्री मानो पारस पा गया। अंधे को सुन्दर नेत्रों का लाभ हुआ। गूँगे के मुख में मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीर ने मानो युद्ध में विजय पा ली।

दोहा

एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥ ३५० (क) ॥

अर्थ:

इन सुखों से सौ करोड़ गुना बढ़कर आनन्द माताएँ पा रही हैं। क्योंकि रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयों सहित घर आये हैं।

दोहा

लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं॥ ३५० (ख) ॥

अर्थ:

माताएँ लोकरीति करती हैं और दूलह-दुलहिनें सकुचाते हैं। इस महान् आनन्द और विनोद को देखकर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं।

दोहा 351 के अंतर्गत
चौपाई

देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥ सबहि बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥ १ ॥

अर्थ:

मन की सभी वासनाएँ पूरी हुई जानकर देवता और पितरों का भलीभाँति पूजन किया। सबकी वन्दना करके माताएँ यही वरदान माँगती हैं कि भाइयों सहित श्रीरामजी का कल्याण हो।

चौपाई

अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं॥ भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥ २ ॥

अर्थ:

देवता छिपे हुए [अन्तरिक्ष से] आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएँ आनन्दित हो आँचल भरकर ले रही हैं। तदनन्तर राजा ने बरातियों को बुलवा लिया और उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, मणि (रत्न) और आभूषण आदि दिये।

चौपाई

आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि॥ पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए॥ ३ ॥

अर्थ:

आज्ञा पाकर, श्रीरामजी को हृदय में रखकर वे सब आनन्दित होकर अपने-अपने घर गये। नगर के समस्त स्त्री-पुरुषों को राजा ने कपड़े और गहने पहनाये। घर-घर बधावे बजने लगे।

चौपाई

जाचक जन जाचहिं जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई॥ सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना॥ ४ ॥

अर्थ:

याचक लोग जो-जो माँगते हैं, विशेष प्रसन्न होकर राजा उन्हें वही-वही देते हैं। सम्पूर्ण सेवकों और बाजेवालों को राजाने नाना प्रकार के दान और सम्मान से सन्तुष्ट किया।

दोहा

देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ॥ ३५१ ॥

अर्थ:

सब जोहार करके आशिष देते हैं और गुणसमूहों की कथा गाते हैं। तब गुरु और ब्राह्मणों सहित राजा दशरथजी ने महल में गमन किया।

दोहा 352 के अंतर्गत
चौपाई

जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥ भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥ १ ॥

अर्थ:

वसिष्ठजी ने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार राजा ने आदरपूर्वक किया। ब्राह्मणों की भीड़ देखकर अपना बड़ा भाग्य जानकर सब रानियाँ आदर के साथ उठीं।

चौपाई

पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए॥ आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे॥ २ ॥

अर्थ:

चरण धोकर उन्होंने सबको स्नान कराया और राजा ने भलीभाँति पूजन करके उन्हें भोजन कराया। आदर, दान और प्रेम से पुष्ट हुए वे सन्तुष्ट मन से आशीर्वाद देते हुए चले।

चौपाई

बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥ कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा ने गाधि-पुत्र विश्वामित्रजी की बहुत तरह से पूजा की और कहा-हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है। राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियों सहित उनकी चरणधूलि को ग्रहण किया।

चौपाई

भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृपु रनिवासू॥ पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्हें महल के भीतर ठहरने को उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और रनिवास उनका मन जोगवत रह सके। फिर राजा ने गुरु वसिष्ठजी के चरणकमलों की पूजा और विनती की। उनके हृदय में कम प्रीति न थी।

दोहा

बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु॥ ३५२ ॥

अर्थ:

बहुओं समेत सब कुमार और रानियों सहित राजा बार-बार गुरुजी के चरणों की वन्दना करते हैं और मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं।

दोहा 353 के अंतर्गत
चौपाई

बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥ नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से पुत्रों की और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर [उन्हें स्वीकार करने के लिये] विनती की। परन्तु मुनिराज ने [पुरोहित के नाते] केवल अपना नेग माँग लिया और बहुत तरह से आशीर्वाद दिया।

चौपाई

उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥ बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराईं॥ २ ॥

अर्थ:

फिर सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर गुरु वसिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थान को गये। राजा ने सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये।

चौपाई

बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥ नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर सब सुआसिनियों को (नगर भर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदि) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर [उसी के अनुसार] उन्हें पहिरावनी दी। नेगी लोग सब अपना-अपना नेग-जोग लेते और राजाओं के शिरोमणि दशरथजी उनकी रुचि के अनुसार देते हैं।

चौपाई

प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥ देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

जिन मेहमानों को प्रिय और पूजनीय जाना, उनका राजा ने भलीभाँति सम्मान किया। देवगण श्रीरघुबीर के विवाह को देखकर, उत्सव की प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए--।

दोहा

चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥ ३५३ ॥

अर्थ:

नगाड़े बजाकर और [परम] सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकों को चले। वे एक-दूसरे से श्रीरामजी का यश कहते जाते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है।

दोहा 354 के अंतर्गत
चौपाई

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥ जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥ १ ॥

अर्थ:

सब प्रकार से सबका समादर कर लेने पर राजा दशरथजी के हृदय में पूर्ण उत्साह भर गया। जहाँ रनिवास था, वहाँ वे पधारे और बहुओं समेत उन्होंने कुमारों को देखा।

चौपाई

लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥ बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥ २ ॥

अर्थ:

राजा ने आनन्द सहित पुत्रों को गोद में ले लिया। उस समय राजाको जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओं को प्रेम सहित गोदी में बैठाकर, बार-बार हृदय में हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार किया।

चौपाई

देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥ कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥ ३ ॥

अर्थ:

यह समाज देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया। सब के हृदय में आनन्द ने निवास कर लिया। तब राजा ने जिस तरह विवाह हुआ था, वह सब कहा। उसे सुन-सुनकर सबको हर्ष होता है।

चौपाई

जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥ बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानी सब प्रमुदित सुनि करनी॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा जनक के गुण, शील, बड़ाई, प्रीति-रीति और सुहावनी सम्पत्ति का वर्णन राजा ने भाट की तरह बहुत प्रकार से किया। जनकजी की करनी सुनकर सब रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं।

दोहा

सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥ ३५४ ॥

अर्थ:

पुत्रों सहित स्नान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार के भोजन किये। [यह सब करते-करते] पाँच घड़ी रात बीत गयी।

दोहा 355 के अंतर्गत
चौपाई

मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥ अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥ १ ॥

अर्थ:

सुन्दर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गयी। सबने आचमन करके पान खाये और फूलों की माला, सुगन्धित द्रव्य आदि से विभूषित होकर सब शोभा से छा गये।

चौपाई

रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥ प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर को चले। वहाँ के प्रेम, आनन्द, विनोद, बड़ाई, समय, समाज और मनोहरता—

चौपाई

कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥ सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥ ३ ॥

अर्थ:

सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते। फिर भला मैं उसे किस प्रकार से बखानकर कहूँ? भूमिनाग सिर धरता है या धरती!

चौपाई

नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी॥ बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा ने सबका सब प्रकार से सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियों को बुलाया और कहा— बहुएँ छोटी बच्चियाँ हैं, पराये घर आई हैं। इनको इस तरह से रखना जैसे नेत्रों को पलकें रखती हैं।

दोहा

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥ ३५५ ॥

अर्थ:

लड़के थके हुए हैं, नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में मन लगाकर विश्रामगृह में चले गये।

दोहा 356 के अंतर्गत
चौपाई

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥ सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥ १ ॥

अर्थ:

राजा के वचन सुनकर [रानियों ने] स्वभाव से ही सुन्दर [शय्याएँ] सजाईं। मणि-जटित सुवर्ण के पलँग बिछवाये। गौ के दूध के फेन के समान सुन्दर और कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछायीं।

चौपाई

उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥ रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियों के मन्दिर में फूलों की मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नों के दीपकों और सुन्दर चँदोवे की शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है।

चौपाई

सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥ अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥ ३ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सुन्दर शय्या सजाकर [माताओं ने] श्रीरामचन्द्रजी को उठाया और प्रेमसहित पलँगपर पौढ़ाया। श्रीरामजी ने बार-बार भाइयों को आज्ञा दी। तब वे भी अपनी-अपनी शय्याओंपर सो गये।

चौपाई

देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥ मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के साँवले, सुन्दर, कोमल अंगों को देखकर सब माताएँ प्रेमसहित वचन कह रही हैं— हे तात! मार्ग में जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसी को किस प्रकार से मारा?

दोहा

घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥ ३५६ ॥

अर्थ:

बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्ध में किसीको कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहु को सहायकोंसहित तुमने कैसे मारा?

दोहा 357 के अंतर्गत
चौपाई

मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥ मख रखवारी करि दुहुँ भाईं। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने तुम्हारी बहुत-सी बलाओं को टाल दिया। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके गुरुजी के प्रसाद से सब विद्याएँ पायीं।

चौपाई

मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥ कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥ २ ॥

अर्थ:

चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गयी। विश्व भर में यह कीर्ति पूर्ण रीति से व्याप्त हो गयी। कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया।

चौपाई

बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥ सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥ ३ ॥

अर्थ:

विश्व विजय के यश और जानकी को पाकर, आए भवन ब्याहि सब भाई। तुम्हारे सभी कर्म अमानुष हैं (मनुष्य की शक्ति के बाहर हैं), जिन्हें केवल कौसिक कृपा से सुधारे है (सम्पन्न किया है)।

चौपाई

आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥ जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जग में जन्म लेना सफल हुआ। तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनती में न लावें (हमारी आयु में शामिल न करें)।

दोहा

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन॥ ३५७ ॥

अर्थ:

विनयभरे उत्तम वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को संतुष्ट किया। फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण कर नेत्रों को नींद के वश किया (अर्थात् वे सो रहे)।

दोहा 358 के अंतर्गत
चौपाई

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥ घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥ १ ॥

अर्थ:

नींद में भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो संध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो। स्त्रियाँ घर-घर जागरण कर रही हैं और आपस में (एक-दूसरी को) मंगलमयी गालियाँ दे रही हैं।

चौपाई

पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥ सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥ २ ॥

अर्थ:

रानियाँ कहती हैं—हे सजनी! देखो, [आज] रात्रि की कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! [यों कहती हुई] सासुएँ सुंदर बहुओं को लेकर सो गईं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियों को हृदय में छिपा लिया है।

चौपाई

प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥ बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रातःकाल पवित्र ब्राह्ममुहूर्त में प्रभु जागे। मुर्गे सुन्दर बोलने लगे। भाट और मागधों ने गुणों का गान किया तथा नगर के लोग द्वार पर जोहार करने को आये।

चौपाई

बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥ जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥ ४ ॥

अर्थ:

ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वन्दना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओं ने आदर के साथ उनके मुखों को देखा। फिर वे राजा के साथ दरवाजे पर पधारे।

दोहा

कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥ ३५८ ॥

अर्थ:

स्वभाव से ही पवित्र चारों भाइयों ने सब शौचादि से निवृत्त होकर पवित्र सरयू नदी में स्नान किया और प्रातःक्रिया करके वे पिता के पास आये।

दोहा 359 के अंतर्गत
चौपाई

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥ देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गये। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर और नेत्रों के लाभ की यही सीमा है, ऐसा अनुमान कर सारी सभा शीतल हो गयी (अर्थात् सबके तीनों प्रकार के ताप सदाके लिये मिट गये)।

चौपाई

पुनि बसिष्टु मुनि कौसिकु आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥ सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥ २ ॥

अर्थ:

फिर मुनि वसिष्ठजी और विश्वामित्रजी आये। राजा ने उनको सुंदर आसनों पर बैठाया और पुत्रों सहित उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे। दोनों गुरु श्रीरामजी को देखकर प्रेम में मुग्ध हो गये।

चौपाई

कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥ मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥ ३ ॥

अर्थ:

वसिष्ठजी धर्म के इतिहास कह रहे हैं और राजा रानिवास सहित सुन रहे हैं। जो मुनियों के मन को भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजी की करनी को वसिष्ठजी ने आनन्दित होकर बहुत प्रकार से वर्णन किया।

चौपाई

बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥ सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

वामदेवजी बोले—ये सब बातें सत्य हैं। विश्वामित्रजी की सुंदर कीर्ति तीनों लोकों में छायी हुई है। यह सुनकर सब किसी को आनन्द हुआ। श्रीराम-लक्ष्मण के हृदय में अधिक उत्साह (आनन्द) हुआ।

दोहा

मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥ ३५९ ॥

अर्थ:

नित्य ही मंगल, आनन्द और उत्सव होते हैं; इस तरह आनन्द में दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनन्द से भरकर उमड़ पड़ी, आनन्द की अधिकता अधिक-अधिक बढ़ती ही जा रही है।

दोहा 360 के अंतर्गत
चौपाई

सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥ नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधकर सुन्दर कंकन छोड़े गये। मंगल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए (अर्थात् बहुत हुए)। इस प्रकार नित्य नये सुख को देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्या में जन्म पाने के लिये ब्रह्माजी से याचना करते हैं।

चौपाई

बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥ दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥ २ ॥

अर्थ:

विश्वामित्रजी नित्य ही चलना (अपने आश्रम जाना) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के स्नेह और विनय वश रह जाते हैं। दिनों-दिन राजा का सौगुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं।

चौपाई

मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥ नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

अन्त में जब विश्वामित्रजी ने विदा माँगी, तब राजा प्रेममग्न हो गये और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गये। [वे बोले—] हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूँ।

चौपाई

करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसनु देत रहब मुनि मोहू॥ अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहियेगा और मुझे भी दर्शन देते रहियेगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़े, [प्रेमविह्वल हो जाने के कारण] उनके मुँह से बात नहीं निकलती।

चौपाई

दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥ रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥ ५ ॥

अर्थ:

ब्राह्मण विश्वामित्रजी ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीति की रीति कही नहीं जाती। सब भाइयों को साथ लेकर श्रीरामजी प्रेम के साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे।

दोहा

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥ ३६० ॥

अर्थ:

गाधिकुल के चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्ष के साथ श्रीरामचन्द्रजी के रूप, राजा दशरथजी की भक्ति, [चारों भाइयों के] विवाह और [सबके] उत्साह और आनन्द को मन ही मन सराहते जाते हैं।

दोहा 361 के अंतर्गत
चौपाई

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥ सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

वामदेवजी और रघुकुल के गुरु ज्ञानी वसिष्ठजी ने फिर विश्वामित्रजी की कथा बखानकर कही। मुनि का सुन्दर यश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पुण्यों के प्रभाव का बखान करने लगे।

चौपाई

बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥ जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥ २ ॥

अर्थ:

आज्ञा हुई तब सब लोग [अपने-अपने घरों को] लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रों सहित महल में गये। जहाँ-तहाँ सब श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की गाथाएँ गा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी का पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया।

चौपाई

आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥ प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥ ३ ॥

अर्थ:

जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे सब प्रकार का आनन्द अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में जैसा आनन्द-उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते।

चौपाई

कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥ तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

राम-सीता के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगलों की खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये कुछ (थोड़ा-सा) बखानकर कहा है।