बारात का अयोध्या लौटना और अयोध्या में आनन्द
विवाह के उपरांत बारात नववधुओं सहित अयोध्या लौटती है। नगरवासी प्रेम और उल्लास से उनका स्वागत करते हैं, और अयोध्या आनंदमय हो उठती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५८ / ५९
प्रकरण पाठ
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥ महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥ ४ ॥
अर्थ:
जिनको मन सहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमा को वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालों में एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं।
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥ मैं कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥ २ ॥
अर्थ:
तो भी हे रघुनाथजी ! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणों की कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती। मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह अपने इस एक ही बल पर कि आप अत्यन्त थोड़े स्नेह से प्रसन्न हो जाते हैं।
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥ सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥ ३ ॥
अर्थ:
मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े। जनकजी के श्रेष्ठ वचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए।
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥ बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही॥ ४ ॥
अर्थ:
उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्ठजी के समान जानकर ससुर जनकजी का सम्मान किया। फिर जनकजी ने भरतजी से विनती की और प्रेम के साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया।
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥ जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥ २ ॥
अर्थ:
[उन्होंने कहा—] हे मुनीश्वर! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में ऐसा विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपति चाहते हैं; परन्तु [असंभव समझकर] जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं।
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥ कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥ ३ ॥
अर्थ:
हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियाँ आपके दर्शन की अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलने वाली हैं। इस प्रकार बार-बार विनती की और सिर नवाकर तथा आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे।
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥ झाँझि बिरव डिंडिमी सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥ १ ॥
अर्थ:
नगाड़ों पर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढोल बजने लगे। भेरी और शंख की ध्वनि हो रही है; हाथी-घोड़े गरज रहे हैं। विशेष शब्द करने वाली झाँझें, सुहावनी डिंडिमियाँ तथा रसीले राग से शहनाइयाँ बज रही हैं।
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि॥ सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥ ३ ॥
अर्थ:
सुहागिनी स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छवि से कामदेव की स्त्रियों को भी निरादर कर रही हैं। सभी सुन्दर मंगल-द्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हैं, मानो सरस्वतीजी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों।
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥ राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥ १ ॥
अर्थ:
सुख और महान् आनन्द से विवश होने के कारण सब माताओं के शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये वे अत्यन्त अनुराग में भरकर परिछन का सब सामान सजाने लगीं।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥ छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥ ३ ॥
अर्थ:
तथा अक्षत (चावल), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसी की सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं। नाना रंगों से चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्ण के कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेव के पक्षियों ने घोंसले बनाये हों।
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥ सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँबलाक अवलि मनु करषहिं॥ १ ॥
अर्थ:
धूप के धुएँ से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़-घुमड़कर छा गये हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलों की पंक्ति मन को अपनी ओर खींच रही हो।
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥ प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥ २ ॥
अर्थ:
सुन्दर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों। अटारियों पर सुन्दर और चपल स्त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं (आती-जाती हैं); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजली चमक रही हो।
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥ जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥ १ ॥
अर्थ:
मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों को उजागर (सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाशस्वरूप) श्रीरामचन्द्रजी का यश गा रहे हैं। जयध्वनि तथा वेद की निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मंगल से सनी हुई दसों दिशाओं में सुनाई पड़ रही है।
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥ करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥ ३ ॥
अर्थ:
तब अयोध्यावासियों ने राजा को जोहार (वन्दना) की। श्रीरामचन्द्रजी को देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियाँ और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं।
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥ देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥ ४ ॥
अर्थ:
चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाओं को खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि वे उन्हें सभी बिल्कुल तुच्छ जान पड़ीं। तब हारकर वे भी श्रीरामजी के रूप में अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं।
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥ बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥ २ ॥
अर्थ:
फिर वेद की विधि के अनुसार मंगलनिधि दूलह और दुलहिनों की धूप, दीप और नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा की। माताएँ बारंबार आरती कर रही हैं और वर-वधुओं के सिरों पर सुन्दर पंखे तथा चँवर ढल रहे हैं।
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं॥ भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥ २ ॥
अर्थ:
देवता छिपे हुए [अन्तरिक्ष से] आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएँ आनन्दित हो आँचल भरकर ले रही हैं। तदनन्तर राजा ने बरातियों को बुलवा लिया और उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, मणि (रत्न) और आभूषण आदि दिये।
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥ कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा ने गाधि-पुत्र विश्वामित्रजी की बहुत तरह से पूजा की और कहा-हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है। राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियों सहित उनकी चरणधूलि को ग्रहण किया।
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥ नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥ १ ॥
अर्थ:
राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से पुत्रों की और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर [उन्हें स्वीकार करने के लिये] विनती की। परन्तु मुनिराज ने [पुरोहित के नाते] केवल अपना नेग माँग लिया और बहुत तरह से आशीर्वाद दिया।
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥ नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
फिर सब सुआसिनियों को (नगर भर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदि) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर [उसी के अनुसार] उन्हें पहिरावनी दी। नेगी लोग सब अपना-अपना नेग-जोग लेते और राजाओं के शिरोमणि दशरथजी उनकी रुचि के अनुसार देते हैं।
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥ बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥ २ ॥
अर्थ:
राजा ने आनन्द सहित पुत्रों को गोद में ले लिया। उस समय राजाको जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओं को प्रेम सहित गोदी में बैठाकर, बार-बार हृदय में हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार किया।
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥ रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥ २ ॥
अर्थ:
सुन्दर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियों के मन्दिर में फूलों की मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नों के दीपकों और सुन्दर चँदोवे की शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है।
मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥ कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥ २ ॥
अर्थ:
चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गयी। विश्व भर में यह कीर्ति पूर्ण रीति से व्याप्त हो गयी। कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया।
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥ सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥ २ ॥
अर्थ:
रानियाँ कहती हैं—हे सजनी! देखो, [आज] रात्रि की कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! [यों कहती हुई] सासुएँ सुंदर बहुओं को लेकर सो गईं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियों को हृदय में छिपा लिया है।
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥ देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥ १ ॥
अर्थ:
राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गये। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर और नेत्रों के लाभ की यही सीमा है, ऐसा अनुमान कर सारी सभा शीतल हो गयी (अर्थात् सबके तीनों प्रकार के ताप सदाके लिये मिट गये)।
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥ मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥ ३ ॥
अर्थ:
वसिष्ठजी धर्म के इतिहास कह रहे हैं और राजा रानिवास सहित सुन रहे हैं। जो मुनियों के मन को भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजी की करनी को वसिष्ठजी ने आनन्दित होकर बहुत प्रकार से वर्णन किया।
सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥ नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधकर सुन्दर कंकन छोड़े गये। मंगल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए (अर्थात् बहुत हुए)। इस प्रकार नित्य नये सुख को देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्या में जन्म पाने के लिये ब्रह्माजी से याचना करते हैं।
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥ दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥ २ ॥
अर्थ:
विश्वामित्रजी नित्य ही चलना (अपने आश्रम जाना) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के स्नेह और विनय वश रह जाते हैं। दिनों-दिन राजा का सौगुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं।
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसनु देत रहब मुनि मोहू॥ अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥ ४ ॥
अर्थ:
हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहियेगा और मुझे भी दर्शन देते रहियेगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़े, [प्रेमविह्वल हो जाने के कारण] उनके मुँह से बात नहीं निकलती।
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥ जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥ २ ॥
अर्थ:
आज्ञा हुई तब सब लोग [अपने-अपने घरों को] लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रों सहित महल में गये। जहाँ-तहाँ सब श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की गाथाएँ गा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी का पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया।
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥ प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥ ३ ॥
अर्थ:
जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे सब प्रकार का आनन्द अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में जैसा आनन्द-उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते।