चारि सिंघासन सहज सुहाए

चौपाई १, दोहा ३५० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥ तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥ १ ॥

अर्थ

स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने ही अपने हाथ से बनाये थे। उन पर माताओं ने राजकुमारियों और राजकुमारों को बैठाया और आदर के साथ उनके पवित्र चरण धोये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना