करहिं आरती बारहिं बारा
करहिं आरती बारहिं बारा
चौपाई १, दोहा ३४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥ भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥ १ ॥
अर्थ
वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान् आनन्द को कौन कह सकता है! अनेक प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकार की अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना