अंतरहित सुर आसिष देहीं
अंतरहित सुर आसिष देहीं
चौपाई २, दोहा ३५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं॥ भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥ २ ॥
अर्थ
देवता छिपे हुए [अन्तरिक्ष से] आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएँ आनन्दित हो आँचल भरकर ले रही हैं। तदनन्तर राजा ने बरातियों को बुलवा लिया और उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, मणि (रत्न) और आभूषण आदि दिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना