कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि
दोहा ३४६ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥ ३४६ ॥
अर्थ
सोने के थालों को मंगल-सामग्रियों से भरकर अपने कमल के समान (कोमल) हाथों में लिये हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावली से छा गये हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का दोहा ३४६ है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना