होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं

दोहा ३४७ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ। बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥ ३४७ ॥

अर्थ

शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा-बजाकर फूल बरसा रहे हैं। देवताओं की स्त्रियाँ आनन्दित होकर सुन्दर मंगल-गीत गा-गाकर नाच रही हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का दोहा ३४७ है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना