सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही

चौपाई ३, दोहा ३४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥ बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥ ३ ॥

अर्थ

सखियाँ सीताजी के मुख को बार-बार देखकर अपने पुण्यों की सराहना करती हुई गान कर रही हैं। देवता क्षण-क्षण में फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पित करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना