उपबरहन बर बरनि न जाहीं

चौपाई २, दोहा ३५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥ रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥ २ ॥

अर्थ

सुन्दर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियों के मन्दिर में फूलों की मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नों के दीपकों और सुन्दर चँदोवे की शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना