बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा
चौपाई ३, दोहा ३५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥ कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥ ३ ॥
अर्थ
राजा ने गाधि-पुत्र विश्वामित्रजी की बहुत तरह से पूजा की और कहा-हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है। राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियों सहित उनकी चरणधूलि को ग्रहण किया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना