करि बर बिनय ससुर सनमाने
करि बर बिनय ससुर सनमाने
चौपाई ४, दोहा ३४२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥ बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही॥ ४ ॥
अर्थ
उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्ठजी के समान जानकर ससुर जनकजी का सम्मान किया। फिर जनकजी ने भरतजी से विनती की और प्रेम के साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना