कहि न सकहिं सत सारद सेसू
कहि न सकहिं सत सारद सेसू
चौपाई ३, दोहा ३५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥ सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥ ३ ॥
अर्थ
सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते। फिर भला मैं उसे किस प्रकार से बखानकर कहूँ? भूमिनाग सिर धरता है या धरती!
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना