श्रीसीता-राम विवाह

विधिपूर्वक श्रीसीता-राम विवाह संपन्न होता है और साथ ही अन्य राजकुमारों के विवाह भी मंगलमय रीति से सम्पन्न होते हैं। वैदिक मंत्रों, देवों की प्रसन्नता और लोकानंद से जनकपुर पवित्र उत्सव में डूब जाता है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५७ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥ सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

जनकजी की जगद्विख्यात पटरानी और सीताजी की माता का बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और सुन्दरता सबको बटोरकर विधाता ने उन्हें सँवारकर तैयार किया है।

चौपाई

समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥ जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥ २ ॥

अर्थ:

समय जानकर श्रेष्ठ मुनियों ने उनको बुलवाया। यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आईं। सुनयना जी (जनकजी की पटरानी) जनकजी की बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचल के साथ मैना जी शोभित हों।

चौपाई

कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥ निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥ ३ ॥

अर्थ:

पवित्र, सुगन्धित और मंगल जल से भरे सोने के कलश और मणियों की सुन्दर परातें राजा और रानी ने आनन्दित होकर अपने हाथों से लाकर श्रीरामचन्द्रजी के आगे रखीं।

चौपाई

पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥ बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि मंगलवाणी से वेद पढ़ रहे हैं। सुअवसर जानकर आकाश से फूलों की झड़ी लग गई है। दूलह को देखकर राजा-रानी प्रेममग्न हो गये और उनके पवित्र चरणों को पखारने लगे।

छन्द

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥ जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जेसकृतसुमिरतबिमलता मनसकल कलि मल भाजहीं॥ १ ॥

अर्थ:

वे श्रीरामजी के चरणकमलों को पखारने लगे, प्रेम से उनके शरीर में पुलकावली छा रही है। आकाश और नगर में गान, नगाड़े और जय-ध्वनि की आवाज़ मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली। जो चरणसरोज कामदेव के शत्रु श्रीशिवजी के उर-सरोवर में सदा ही विराजते हैं, जिनका स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और कलियुग के सारे मल भाग जाते हैं।

छन्द

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥ करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥ २ ॥

अर्थ:

जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनि की स्त्री अहल्या ने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलों का मकरन्द-रस शिवजी के मस्तक पर विराजमान है, जिसे देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मन को भौंरा बनाकर जिन चरणकमलों का सेवन करके मनोवांछित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणों को भाग्यभाजन जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं।

छन्द

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥ सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥ ३ ॥

अर्थ:

दोनों कुलों के गुरुवर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर साखोचार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द में भर गये। सुख के मूल दूलह को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्द से उमँग उठा। राजाओं के अलंकारस्वरूप महाराज जनकजी ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया।

छन्द

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥ क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥ ४ ॥

अर्थ:

जैसे हिमवान ने शिवजी को पार्वती जी और सागर ने भगवान् विष्णु को लक्ष्मी जी दी थीं, वैसे ही जनकजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्व में सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी। विदेह (जनकजी) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्ति ने तो उन्हें सचमुच विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं।

दोहा

जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान। सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥ ३२४ ॥

अर्थ:

जयध्वनि, बन्दीध्वनि, वेदध्वनि, मंगलगान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्ष के फूलों को बरसा रहे हैं।

दोहा 325 के अंतर्गत
चौपाई

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥ जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥ १ ॥

अर्थ:

वर और कन्या सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक [उन्हें देखकर] नेत्रों का लाभ ले रहे हैं। मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूँ वही थोड़ी होगी।

चौपाई

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥ मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी और श्रीसीताजी की सुन्दर परछाईं मणियों के खम्भों में जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत-से रूप धारण करके श्रीरामजी के अनुपम विवाह को देख रहे हैं।

चौपाई

दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥ भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्हें (कामदेव और रति को) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं (अर्थात् बहुत हैं); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजी की भाँति सभी अपनी सुध भूल गये।

चौपाई

प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥ राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनियों ने आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरायीं और नेग सहित सब रीतियों को पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती।

चौपाई

अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥ बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥ ५ ॥

अर्थ:

मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से साँप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है। [यहाँ श्रीराम के हाथ को कमल की, सिंदूर को पराग की, श्रीराम की श्याम भुजा को साँप की और सीताजी के मुख को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है] फिर वसिष्ठजी ने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसन पर बैठे।

छन्द

बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मन में बहुत आनन्दित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्ष में नये फल [आये] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!

छन्द

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥ २ ॥

अर्थ:

तब वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी—इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशकेतु की बड़ी कन्या माण्डवीजी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजी को ब्याह दिया।

छन्द

जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥ जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥ ३ ॥

अर्थ:

जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुन्दरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है तथा जो सुन्दर नेत्रोंवाली, सुन्दर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उज्ज्वल हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया।

छन्द

अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचते हुए हृदय में हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्हों के साथ एक ही मण्डप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों।

दोहा

मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ ३२५ ॥

अर्थ:

सब पुत्रों को बहुओं समेत देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं, मानो वे राजाओं के शिरोमणि, क्रियाओं (यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया) सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) पा गये हों।

दोहा 326 के अंतर्गत
चौपाई

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥ कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की जैसी विधि वर्णन की गयी, उसी रीति से सब राजकुमार विवाहे गये। दहेज की अधिकता कुछ कही नहीं जाती; सारा मंडप सोने और मणियों से भर गया।

चौपाई

कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥ गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥ २ ॥

अर्थ:

बहुत-से कंबल, वस्त्र और भाँति-भाँति के विचित्र रेशमी कपड़े, जो थोड़ी कीमत के न थे (अर्थात् बहुमूल्य थे) तथा हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और गहनों से सजी हुई कामधेनु-सरीखी गायें--।

चौपाई

बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥ लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥ ३ ॥

अर्थ:

[आदि] अनेकों वस्तुएँ हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाय। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल भी सिहा गये। अवधराज दशरथजी ने सुख मानकर प्रसन्नचित्त से सब कुछ ग्रहण किया।

चौपाई

दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥ तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने वह दहेज का सामान याचकों को, जो जिसे अच्छा लगा, दे दिया। जो बच रहा, वह जनवासे में चला आया। तब जनकजी हाथ जोड़कर सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी से बोले।

छन्द

सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥ सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥ १ ॥

अर्थ:

आदर, दान, विनय और बड़ाई के द्वारा सारी बारात का सम्मान कर राजा जनक ने महान आनन्द के साथ प्रेमपूर्वक लाड़ करके मुनियों के समूह की पूजा एवं वन्दना की। सिर नवाकर, देवताओं को मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं (वे प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हैं; उन पूर्णकाम महानुभावों को कोई कुछ देकर कैसे सन्तुष्ट कर सकता है); क्या एक अंजलि जल देने से कहीं समुद्र सन्तुष्ट हो सकता है।

छन्द

कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥ संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥ २ ॥

अर्थ:

फिर जनकजी भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथजी से स्नेह, शील और सुन्दर प्रेम में सानकर मनोहर वचन बोले--हे राजन्! आपके साथ सम्बन्ध हो जाने से अब हम सब प्रकार से बड़े हो गये। इस राज-पाट सहित हम दोनों को आप बिना दाम के लिये हुए सेवक ही समझियेगा।

छन्द

ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥ पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥ ३ ॥

अर्थ:

इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नयी-नयी दया करके पालन कीजिएगा। मैंने बड़ी ढीठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजिएगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को सम्पूर्ण सम्मान की निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि वे सम्मान के भण्डार ही हो गये)। उनकी परस्पर की विनती कही नहीं जाती, दोनों के हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं।

छन्द

बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥ तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥ ४ ॥

अर्थ:

देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनन्द छा रहा है)। तब मुनीश की आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियाँ मंगल गान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं।

दोहा

पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ ३२६ ॥

अर्थ:

सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं; पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुन्दर मछलियों की छबि को हर रहे हैं।

दोहा 327 के अंतर्गत
चौपाई

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥ जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजानेवाली है। महावर से युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिन पर मुनियों के मनरूपी भौरे सदा छाये रहते हैं।

चौपाई

पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥ कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥ २ ॥

अर्थ:

पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कमर में सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओं में सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं।

चौपाई

पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥ सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे॥ ३ ॥

अर्थ:

पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथ की अँगूठी चित्त को चुरा लेती है। ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छाती पर हृदय पर पहनने के सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं।

चौपाई

पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥ नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥ ४ ॥

अर्थ:

पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊ की तरह) शोभित है, जिसके दोनों आँचलों से मणि और मोती लगे हैं। कमल के समान सुन्दर नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरता का खजाना ही है।

चौपाई

सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥ सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥ ५ ॥

अर्थ:

सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाट पर तिलक तो सुन्दरता का घर ही है। जिसमें मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माथे पर सोह रहा है।

छन्द

गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥ मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥ १ ॥

अर्थ:

सुन्दर मौर में बहुमूल्य मणियाँ गुँथी हुई हैं, सभी अंग चित्त को चुराये लेते हैं। सब नगर की स्त्रियाँ और देवसुंदरियाँ दूलह को देखकर तिनका तोड़ रही हैं (उनकी बलैयाँ ले रही हैं) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण वार कर आरती उतार रही हैं और मंगल गा रही हैं। देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं।

छन्द

कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥ लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥ २ ॥

अर्थ:

सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियों को कोहबर (कुलदेवता के स्थान) में लायीं और अत्यन्त प्रेम से मंगलगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। गौरीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर (वर-वधू का परस्पर ग्रास देना) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं। रनिवास हास-विलास के रस में मग्न है, [श्रीरामजी और सीताजी को देख-देखकर] सभी जन्म का फल पा रही हैं।

छन्द

निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥ कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥ ३ ॥

अर्थ:

अपने हाथ की मणियों में सुन्दर रूप के भण्डार की मूर्ति दिखाई देती है। यह देखकर जानकीजी दर्शन में वियोग के भयवश बाहुरूपी लता को नहीं हिलातीं-डुलातीं। कौतुक, विनोद, प्रमोद और प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता; उन्हें सखियाँ ही जानती हैं। तब वर-कन्याओं को सभी सुन्दर सखियाँ जनवासे को लिवा चलीं।

छन्द

तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्‌यो मुदित मन सबहीं कहा॥ जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥ ४ ॥

अर्थ:

उस समय नगर और आकाश में जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वाद की ध्वनि सुनायी दे रही है और महान् आनन्द छाया है। सभी ने प्रसन्न मन से कहा कि सुन्दर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगींद्र, सिद्ध, मुनीश और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए तथा “जय हो, जय हो, जय हो” कहते हुए वे अपने-अपने लोक को चले।

दोहा

सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥ ३२७ ॥

अर्थ:

तब सब चारों कुमार बहुओं सहित पिताजी के पास आये। ऐसा मालूम होता था मानो शोभा, मंगल और आनन्द से भरकर जनवासा उमड़ पड़ा हो।

दोहा 328 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥ परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥ १ ॥

अर्थ:

फिर बहुत प्रकार की जेवनार बनी। जनकजी ने बारातियों को बुला भेजा। राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित गमन किया। अनुपम वस्त्रों के पाँवड़े पड़ते जाते हैं।

चौपाई

सादर सब के पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥ धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥ २ ॥

अर्थ:

आदर के साथ सब के पाँव धोये और सब को यथायोग्य पीढ़ों पर बैठाया। तब जनकजी ने अवधपति दशरथजी के चरण धोये। उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥ तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों को धोया, जो श्रीशिवजी के हृदय-कमल में छिपे रहते हैं। तीनों भाइयों को श्रीरामचन्द्रजी के ही समान जानकर जनकजी ने उनके भी चरण अपने हाथों से धोये।

चौपाई

आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥ सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा जनकजी ने सभी को उचित आसन दिये और सब परोसने वालों को बुला लिया। आदर के साथ पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियों के पत्तलों से सोने की कील लगाकर बनायी गयी थीं।

दोहा

सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥ ३२८ ॥

अर्थ:

चतुर और विनीत रसोइये सुन्दर, स्वादिष्ट और पवित्र दाल-भात और गाय का [सुगन्धित] घी क्षणभर में सब के सामने परस गये।

दोहा 329 के अंतर्गत
चौपाई

पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥ भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥ १ ॥

अर्थ:

सब लोग पंचकौर करके (अर्थात्‌ 'प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा' इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर) भोजन करने लगे। गाली का गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गये। अनेक प्रकार के अमृत के समान (स्वादिष्ट) पकवान परोसे गये, जिनका बखान नहीं हो सकता।

चौपाई

परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥ चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥ २ ॥

अर्थ:

चतुर रसोइये नाना प्रकार के व्यंजन परोसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकार के (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात्‌ चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खाने योग्य) भोजन की विधि कही गयी है, उनमें से एक-एक विधि के इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥ जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

छह रसों के बहुत तरह के सुन्दर (स्वादिष्ट) व्यंजन हैं। एक-एक रस के अनगिनत प्रकार के बने हैं। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले-लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनि से गाली दे रही हैं (गाली गा रही हैं)।

चौपाई

समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥ एहि बिधि सबहीं भोजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

समय की सुहावनी गाली शोभित हो रही है। उसे सुनकर समाज सहित राजा दशरथजी हँस रहे हैं। इस रीति से सभी ने भोजन किया और तब सबको आदर सहित आचमन (हाथ-मुँह धोने के लिए जल) दिया गया।

दोहा

देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥ ३२९ ॥

अर्थ:

फिर पान देकर जनकजी ने समाज सहित दशरथजी का पूजन किया। सब राजाओं के सिरमौर (चक्रवर्ती) श्रीदशरथजी प्रसन्न होकर जनवासे को चले।

दोहा 330 के अंतर्गत
चौपाई

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥ बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥ १ ॥

अर्थ:

जनकपुर में नित्य नये मंगल हो रहे हैं। दिन और रात पलक के समान बीत जाते हैं। बड़े भोर राजाओं के मुकुटमणि दशरथजी जागे। याचक उनके गुणसमूह का गान करने लगे।

चौपाई

देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥ प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महा प्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

चारों कुमारों को सुन्दर वधुओं सहित देखकर उनके मन में जितना आनन्द है, वह किस प्रकार कहा जा सकता है? वे प्रातःक्रिया करके गुरु वसिष्ठजी के पास गये। उनके मन में महान् आनन्द और प्रेम भरा है।

चौपाई

करि प्रनामु पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥ तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृत में डुबोयी हुई वाणी बोले— हे मुनिराज! सुनिये, आपकी कृपा से आज मैं पूर्णकाम हो गया।

चौपाई

अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाईं॥ सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनिबृंद बोलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे स्वामिन्‌! अब सब ब्राह्मणों को बुलाकर उनको सब तरह [गहनों-कपड़ों] से सजी हुई गायें दीजिये। यह सुनकर गुरुजी ने राजा की बड़ाई करके फिर मुनिगणों को बुलवा भेजा।

दोहा

बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥ ३३० ॥

अर्थ:

तब वामदेव, देवर्षि, वाल्मीकि, जाबालि और कौसिक आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह आये।

दोहा 331 के अंतर्गत
चौपाई

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥ चारि लच्छ बर धेनु मगाईं। काम सुरभि सम सील सुहाईं॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने सबको दण्डवत्‌ प्रणाम किया और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिये। चार लाख उत्तम गायें मँगवायीं, जो कामधेनु के समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं।

चौपाई

सब बिधि सकल अलंकृत कीन्ही। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्ही॥ करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जगजीवन लाहू॥ २ ॥

अर्थ:

उन सबको सब प्रकार से [गहनों-कपड़ों से] सजाकर राजा ने प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणों को दिया। राजा बहुत तरह से विनती कर रहे हैं कि जगत्‌ में मैंने आज ही जीने का लाभ पाया।

चौपाई

पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥ कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥ ३ ॥

अर्थ:

[ब्राह्मणों से] आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकों के समूहों को बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ (जिसने जो चाहा सो) सूर्यकुल को आनन्दित करने वाले दशरथजी ने दिये।

चौपाई

चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥ एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

वे सब गुणानुवाद गाते और 'सूर्यकुल के स्वामी की जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।

दोहा

बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥ ३३१ ॥

अर्थ:

बार-बार विश्वामित्रजी के चरणों में सिर नवाकर राजा कहते हैं— हे मुनिराज! यह सब सुख आपकी ही कृपा-कटाक्ष का प्रसाद है।

दोहा 332 के अंतर्गत
चौपाई

जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥ दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥ १ ॥

अर्थ:

राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं। प्रतिदिन [सबेरे] उठकर अयोध्यानरेश विदा माँगते हैं। पर जनकजी उन्हें प्रेम से रख लेते हैं।

चौपाई

नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥ नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥ २ ॥

अर्थ:

आदर नित्य नया बढ़ता जाता है। प्रतिदिन हजारों प्रकार से मेहमानी होती है। नगर में नित्य नया आनन्द और उत्साह रहता है, दशरथजी का जाना किसीको नहीं सुहाता।

चौपाई

बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥ कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥ ३ ॥

अर्थ:

इस प्रकार बहुत दिन बीत गये, मानो बराती स्नेह की रस्सी से बाँध गये हैं। तब विश्वामित्रजी और शतानन्दजी ने जाकर राजा जनक को समझाकर कहा—।

चौपाई

अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥ भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥ ४ ॥

अर्थ:

यद्यपि आप स्नेह [वश उन्हें] नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजी को आज्ञा दीजिये। 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर जनकजी ने मन्त्रियों को बुलवाया। वे आये और 'जय जीव' कहकर उन्होंने मस्तक नवाया।

दोहा

अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥ ३३२ ॥

अर्थ:

[जनकजी ने कहा—] अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर (रनिवास में) खबर कर दो। यह सुनकर मन्त्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा जनक भी प्रेम के वश हो गये।

दोहा 333 के अंतर्गत
चौपाई

पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥ सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥ १ ॥

अर्थ:

जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जायगी, तब वे व्याकुल होकर एक-दूसरे से बात पूछने लगे। जाना सत्य है, यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गये मानो संध्या के समय कमल सकुचा गये हों।

चौपाई

जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥ बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥ २ ॥

अर्थ:

आते समय जहाँ-जहाँ बराती ठहरे थे, वहाँ-वहाँ बहुत प्रकार का सीधा (रसोई का सामान) भेजा गया। अनेक प्रकार के मेवे, पकवान और भोजन की सामग्री जिसका बखान नहीं किया जा सकता—

चौपाई

भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठईं जनक अनेक सुसारा॥ तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥ ३ ॥

अर्थ:

अनगिनत बैलों और कहारों पर भर-भरकर (लाद-लादकर) भेजी गयी। साथ ही जनकजी ने अनेक सुन्दर शय्याएँ (पलंग) भेजीं। एक लाख घोड़े और पचीस हजार रथ, सब नख से शिखा तक (ऊपर से नीचे तक) सजाये हुए,

चौपाई

मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥ कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥ ४ ॥

अर्थ:

दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी भी लजा जाते हैं, गाड़ियों में भर-भरकर सोना, वस्त्र और रत्न (जवाहरात) तथा भैंस, गाय और और भी नाना प्रकार की चीजें दीं।

दोहा

दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥ ३३३ ॥

अर्थ:

[इस प्रकार] जनकजी ने फिर से अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालों के लोकों की सम्पदा भी थोड़ी जान पड़ती थी।

दोहा 334 के अंतर्गत
चौपाई

सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥ चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सब सामान सजाकर राजा जनक ने अयोध्यापुरी को भेज दिया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गयीं, मानो थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों।

चौपाई

पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं॥ होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥ २ ॥

अर्थ:

वे बार-बार सीताजी को गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं--तुम सदा अपने पति की प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो; हमारी यही आशिष है।

चौपाई

सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥ अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥ ३ ॥

अर्थ:

सास, ससुर और गुरु की सेवा करना। पति का रुख देखकर उनकी आज्ञा का अनुसरण करना। अत्यन्त स्नेह के वश सयानी सखियाँ कोमल वाणी से नारी-धर्म सिखाती हैं।

चौपाई

सादर सकल कुअँरि समुझाईं। रानिन्ह बार बार उर लाईं॥ बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥ ४ ॥

अर्थ:

आदर के साथ सब कुमारियों को समझाईं। रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय में लगा लिया। फिर बार-बार माताएँ भेंटती हैं और कहती हैं—ब्रह्मा ने नारी क्यों रचीं?

दोहा

तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥ ३३४ ॥

अर्थ:

उसी समय सूर्यवंश के पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयों सहित प्रसन्न होकर विदा कराने के लिये जनकजी के महल को चले।

दोहा 335 के अंतर्गत
चौपाई

चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥ कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥ १ ॥

अर्थ:

स्वभाव से ही सुन्दर चारों भाइयों को देखने के लिये नगर के स्त्री-पुरुष दौड़े। कोई कहता है—आज ये जाना चाहते हैं। विदेह ने विदाई का साज तैयार कर लिया है।

चौपाई

लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥ को जानै केहिं सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥ २ ॥

अर्थ:

राजा के चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानों के [मनोहर] रूप को नेत्र भरकर देख लो। हे सयानी! कौन जाने, किस पुण्य से विधाता ने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रों का अतिथि किया है।

चौपाई

मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥ पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें॥ ३ ॥

अर्थ:

मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्म का भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरक में रहनेवाला जीव जैसे हरिपद को प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं।

चौपाई

निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥ एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की शोभा को निरखकर हृदय में धर लो। अपने मन को साँप और इनकी मूर्ति को मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल में गये।

दोहा

रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु॥ ३३५ ॥

अर्थ:

रूप के समुद्र सब भाइयों को देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। सासुएँ महान प्रसन्न मन से निछावर और आरती करती हैं।

दोहा 336 के अंतर्गत
चौपाई

देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥ रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखकर वे प्रेम में अत्यन्त अनुरक्त हो गयीं और प्रेम के वश होकर बार-बार चरणों में लगीं। लज्जा नहीं रही, प्रीति हृदय में छा गयी। सहज स्नेह का वर्णन किस तरह किया जा सकता है।

चौपाई

भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥ बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने भाइयों सहित श्रीरामजी को उबटन लगाकर स्नान कराया और छह रस का अत्यन्त प्रेमपूर्वक भोजन कराया। सुअवसर जानकर श्रीरामचन्द्रजी शील, स्नेह और संकोच से भरी वाणी बोले--

चौपाई

राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥ मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

महाराज अयोध्यापुरी को चलना चाहते हैं। उन्होंने हमें विदा होने के लिये यहाँ भेजा है। हे माता! प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिये और हमें अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखियेगा।

चौपाई

सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥ हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥ ४ ॥

अर्थ:

इन वचनों को सुनते ही रनिवास उदास हो गया। सासुएँ प्रेमवश बोल नहीं सकीं। उन्होंने सब कुमारियों को हृदय से लगा लिया और उनके पतियों को सौंपकर बहुत विनती की।

छन्द

करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥ परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥

अर्थ:

विनती करके सीताजी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार- बार कहा-हे तात ! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति (हाल) मालूम है। परिवार, पुरजन, मुझको और राजाजी को सीता प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसीस! इसके शील और स्नेह को देखकर इसे अपनी किंकरी करके मानियेगा॥।

सोरठा

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥ ३३६ ॥

अर्थ:

तुम्ह पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो (तुम्हें प्रेम प्यारा है)। हे राम! तुम भक्तोंके गुणोंको ग्रहण करनेवाले, दोषोंको नाश करनेवाले और दयाके धाम हो।

दोहा 337 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥ सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर रानी चरणोंको पकड़कर[चुप] रह गयीं। मानो उनकी वाणी प्रेमरूपी दलदलमें समा गयी हो। स्नेहसे सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने सासका बहुत प्रकारसे सम्मान किया।

चौपाई

राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥ पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी ने हाथ जोड़कर विदा माँगते हुए बार-बार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयों सहित श्रीरघुनाथजी चले।

चौपाई

मंजु मधुर मूरति उर आनी। भईं सनेह सिथिल सब रानी॥ पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारीं। बार बार भेटहिं महतारीं॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी की सुन्दर मधुर मूर्ति को हृदय में लाकर सब रानियाँ स्नेह से शिथिल हो गयीं। फिर धीरज धरकर कुमारियों को बुलाकर माताएँ बारंबार उन्हें [गले लगाकर] भेंटने लगीं।

चौपाई

पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥ पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥ ४ ॥

अर्थ:

पुत्रियोंको पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्परमें थोड़ी नहीं, बहुत प्रीति बढ़ी। बार-बार मिलती हुई माताओंको सखियोंने अलग कर दिया। जैसे हालकी ब्यायी हुई गायको कोई उसके बालक बछड़े [या बछिया] से अलग कर दे।

दोहा

प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु॥ ३३७ ॥

अर्थ:

सब स्त्री-पुरुष और सखियोंसहित सारा रनिवास प्रेमके विशेष वश हो रहा है। [ऐसा लगता है] मानो जनकपुरमें करुणा और विरहने डेरा डाल दिया है।

दोहा 338 के अंतर्गत
चौपाई

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥ १ ॥

अर्थ:

जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजरों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं-वैदेही कहाँ हैं। उनके ऐसे वचनों को सुनकर धैर्य किसको नहीं त्याग देगा (अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा)।

चौपाई

भए बिकल खग मृग एहि भाँती। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥ बंधु समेत जनकु तब आए प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥ २ ॥

अर्थ:

जब पक्षी और पशु तक इस तरह विकल हो गये, तब मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती है ! तब भाई समेत जनकजी वहाँ आये। प्रेम से उमड़कर उनके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया।

चौपाई

सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥ लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥ ३ ॥

अर्थ:

वे परम वैराग्यवान् कहलाते थे; पर सीताजी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजा ने जानकीजी को हृदय से लगा लिया। [प्रेम के प्रभाव से] ज्ञान की महान् मर्यादा मिट गयी (ज्ञान का बाँध टूट गया)।

चौपाई

समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥ बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुंदर पालकीं मगाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

सब बुद्धिमान् मन्त्री उन्हें समझाते हैं। तब राजा ने विषाद करने का समय न जानकर विचार किया। बारंबार पुत्रियों को हृदय से लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवायी।

दोहा

प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥ ३३८ ॥

अर्थ:

सारा परिवार प्रेम में विवश है। राजा ने सुन्दर मुहूर्त जानकर सिद्धि सहित गणेशजी का स्मरण करके कन्याओं को पालकियों पर चढ़ाया।

दोहा 339 के अंतर्गत
चौपाई

बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥ दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया और उन्हें स्त्रियों का धर्म और कुल की रीति सिखायी। बहुत-से दासी-दास दिये, जो सीताजी के प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे।

चौपाई

सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥ भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥ २ ॥

अर्थ:

सीताजी के चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गये। हो रहे हैं शुभ मंगल की राशि। ब्राह्मण और मन्त्रियों के समाज सहित राजा जनकजी उन्हें पहुँचाने के लिये साथ चले।

चौपाई

समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥ दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥ ३ ॥

अर्थ:

समय देखकर बाजे बजने लगे। बरातियों ने रथ, हाथी और घोड़े सजाये। दशरथजी ने सब ब्राह्मणों को बुला लिया और उन्हें दान और सम्मान से परिपूर्ण कर दिया।

चौपाई

चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥ सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना॥ ४ ॥

अर्थ:

उनके चरणकमलों की धूलि सिर पर धरकर और आशिष पाकर राजा आनन्दित हुए और गणेशजी का स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया। मंगलमूल अनेक शकुन हुए।

दोहा

सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥ ३३९ ॥

अर्थ:

देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएँ गान कर रही हैं। अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर आनन्दपूर्वक अयोध्यापुरी को चले।