श्रीसीता-राम विवाह
विधिपूर्वक श्रीसीता-राम विवाह संपन्न होता है और साथ ही अन्य राजकुमारों के विवाह भी मंगलमय रीति से सम्पन्न होते हैं। वैदिक मंत्रों, देवों की प्रसन्नता और लोकानंद से जनकपुर पवित्र उत्सव में डूब जाता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५७ / ५९
प्रकरण पाठ
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥ जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥ २ ॥
अर्थ:
समय जानकर श्रेष्ठ मुनियों ने उनको बुलवाया। यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आईं। सुनयना जी (जनकजी की पटरानी) जनकजी की बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचल के साथ मैना जी शोभित हों।
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥ जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जेसकृतसुमिरतबिमलता मनसकल कलि मल भाजहीं॥ १ ॥
अर्थ:
वे श्रीरामजी के चरणकमलों को पखारने लगे, प्रेम से उनके शरीर में पुलकावली छा रही है। आकाश और नगर में गान, नगाड़े और जय-ध्वनि की आवाज़ मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली। जो चरणसरोज कामदेव के शत्रु श्रीशिवजी के उर-सरोवर में सदा ही विराजते हैं, जिनका स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और कलियुग के सारे मल भाग जाते हैं।
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥ करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥ २ ॥
अर्थ:
जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनि की स्त्री अहल्या ने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलों का मकरन्द-रस शिवजी के मस्तक पर विराजमान है, जिसे देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मन को भौंरा बनाकर जिन चरणकमलों का सेवन करके मनोवांछित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणों को भाग्यभाजन जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं।
बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥ सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥ ३ ॥
अर्थ:
दोनों कुलों के गुरुवर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर साखोचार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द में भर गये। सुख के मूल दूलह को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्द से उमँग उठा। राजाओं के अलंकारस्वरूप महाराज जनकजी ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया।
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥ क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥ ४ ॥
अर्थ:
जैसे हिमवान ने शिवजी को पार्वती जी और सागर ने भगवान् विष्णु को लक्ष्मी जी दी थीं, वैसे ही जनकजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्व में सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी। विदेह (जनकजी) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्ति ने तो उन्हें सचमुच विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं।
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥ भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥ ३ ॥
अर्थ:
उन्हें (कामदेव और रति को) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं (अर्थात् बहुत हैं); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजी की भाँति सभी अपनी सुध भूल गये।
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥ बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥ ५ ॥
अर्थ:
मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से साँप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है। [यहाँ श्रीराम के हाथ को कमल की, सिंदूर को पराग की, श्रीराम की श्याम भुजा को साँप की और सीताजी के मुख को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है] फिर वसिष्ठजी ने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसन पर बैठे।
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मन में बहुत आनन्दित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्ष में नये फल [आये] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥ २ ॥
अर्थ:
तब वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी—इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशकेतु की बड़ी कन्या माण्डवीजी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजी को ब्याह दिया।
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥ जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥ ३ ॥
अर्थ:
जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुन्दरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है तथा जो सुन्दर नेत्रोंवाली, सुन्दर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उज्ज्वल हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया।
अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचते हुए हृदय में हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्हों के साथ एक ही मण्डप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों।
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ ३२५ ॥
अर्थ:
सब पुत्रों को बहुओं समेत देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं, मानो वे राजाओं के शिरोमणि, क्रियाओं (यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया) सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) पा गये हों।
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥ लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥ ३ ॥
अर्थ:
[आदि] अनेकों वस्तुएँ हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाय। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल भी सिहा गये। अवधराज दशरथजी ने सुख मानकर प्रसन्नचित्त से सब कुछ ग्रहण किया।
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥ सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥ १ ॥
अर्थ:
आदर, दान, विनय और बड़ाई के द्वारा सारी बारात का सम्मान कर राजा जनक ने महान आनन्द के साथ प्रेमपूर्वक लाड़ करके मुनियों के समूह की पूजा एवं वन्दना की। सिर नवाकर, देवताओं को मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं (वे प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हैं; उन पूर्णकाम महानुभावों को कोई कुछ देकर कैसे सन्तुष्ट कर सकता है); क्या एक अंजलि जल देने से कहीं समुद्र सन्तुष्ट हो सकता है।
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥ संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥ २ ॥
अर्थ:
फिर जनकजी भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथजी से स्नेह, शील और सुन्दर प्रेम में सानकर मनोहर वचन बोले--हे राजन्! आपके साथ सम्बन्ध हो जाने से अब हम सब प्रकार से बड़े हो गये। इस राज-पाट सहित हम दोनों को आप बिना दाम के लिये हुए सेवक ही समझियेगा।
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥ पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥ ३ ॥
अर्थ:
इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नयी-नयी दया करके पालन कीजिएगा। मैंने बड़ी ढीठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजिएगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को सम्पूर्ण सम्मान की निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि वे सम्मान के भण्डार ही हो गये)। उनकी परस्पर की विनती कही नहीं जाती, दोनों के हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं।
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥ तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥ ४ ॥
अर्थ:
देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनन्द छा रहा है)। तब मुनीश की आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियाँ मंगल गान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं।
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥ जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजानेवाली है। महावर से युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिन पर मुनियों के मनरूपी भौरे सदा छाये रहते हैं।
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥ नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥ ४ ॥
अर्थ:
पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊ की तरह) शोभित है, जिसके दोनों आँचलों से मणि और मोती लगे हैं। कमल के समान सुन्दर नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरता का खजाना ही है।
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥ मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥ १ ॥
अर्थ:
सुन्दर मौर में बहुमूल्य मणियाँ गुँथी हुई हैं, सभी अंग चित्त को चुराये लेते हैं। सब नगर की स्त्रियाँ और देवसुंदरियाँ दूलह को देखकर तिनका तोड़ रही हैं (उनकी बलैयाँ ले रही हैं) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण वार कर आरती उतार रही हैं और मंगल गा रही हैं। देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं।
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥ लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥ २ ॥
अर्थ:
सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियों को कोहबर (कुलदेवता के स्थान) में लायीं और अत्यन्त प्रेम से मंगलगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। गौरीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर (वर-वधू का परस्पर ग्रास देना) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं। रनिवास हास-विलास के रस में मग्न है, [श्रीरामजी और सीताजी को देख-देखकर] सभी जन्म का फल पा रही हैं।
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥ कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥ ३ ॥
अर्थ:
अपने हाथ की मणियों में सुन्दर रूप के भण्डार की मूर्ति दिखाई देती है। यह देखकर जानकीजी दर्शन में वियोग के भयवश बाहुरूपी लता को नहीं हिलातीं-डुलातीं। कौतुक, विनोद, प्रमोद और प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता; उन्हें सखियाँ ही जानती हैं। तब वर-कन्याओं को सभी सुन्दर सखियाँ जनवासे को लिवा चलीं।
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्यो मुदित मन सबहीं कहा॥ जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥ ४ ॥
अर्थ:
उस समय नगर और आकाश में जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वाद की ध्वनि सुनायी दे रही है और महान् आनन्द छाया है। सभी ने प्रसन्न मन से कहा कि सुन्दर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगींद्र, सिद्ध, मुनीश और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए तथा “जय हो, जय हो, जय हो” कहते हुए वे अपने-अपने लोक को चले।
पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥ भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥ १ ॥
अर्थ:
सब लोग पंचकौर करके (अर्थात् 'प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा' इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर) भोजन करने लगे। गाली का गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गये। अनेक प्रकार के अमृत के समान (स्वादिष्ट) पकवान परोसे गये, जिनका बखान नहीं हो सकता।
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥ चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥ २ ॥
अर्थ:
चतुर रसोइये नाना प्रकार के व्यंजन परोसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकार के (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात् चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खाने योग्य) भोजन की विधि कही गयी है, उनमें से एक-एक विधि के इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥ जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥ ३ ॥
अर्थ:
छह रसों के बहुत तरह के सुन्दर (स्वादिष्ट) व्यंजन हैं। एक-एक रस के अनगिनत प्रकार के बने हैं। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले-लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनि से गाली दे रही हैं (गाली गा रही हैं)।
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥ प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महा प्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥ २ ॥
अर्थ:
चारों कुमारों को सुन्दर वधुओं सहित देखकर उनके मन में जितना आनन्द है, वह किस प्रकार कहा जा सकता है? वे प्रातःक्रिया करके गुरु वसिष्ठजी के पास गये। उनके मन में महान् आनन्द और प्रेम भरा है।
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥ कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥ ३ ॥
अर्थ:
[ब्राह्मणों से] आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकों के समूहों को बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ (जिसने जो चाहा सो) सूर्यकुल को आनन्दित करने वाले दशरथजी ने दिये।
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥ एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥ ४ ॥
अर्थ:
वे सब गुणानुवाद गाते और 'सूर्यकुल के स्वामी की जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥ रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखकर वे प्रेम में अत्यन्त अनुरक्त हो गयीं और प्रेम के वश होकर बार-बार चरणों में लगीं। लज्जा नहीं रही, प्रीति हृदय में छा गयी। सहज स्नेह का वर्णन किस तरह किया जा सकता है।
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥ परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥
अर्थ:
विनती करके सीताजी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार- बार कहा-हे तात ! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति (हाल) मालूम है। परिवार, पुरजन, मुझको और राजाजी को सीता प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसीस! इसके शील और स्नेह को देखकर इसे अपनी किंकरी करके मानियेगा॥।
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥ पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥ ४ ॥
अर्थ:
पुत्रियोंको पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्परमें थोड़ी नहीं, बहुत प्रीति बढ़ी। बार-बार मिलती हुई माताओंको सखियोंने अलग कर दिया। जैसे हालकी ब्यायी हुई गायको कोई उसके बालक बछड़े [या बछिया] से अलग कर दे।
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥ १ ॥
अर्थ:
जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजरों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं-वैदेही कहाँ हैं। उनके ऐसे वचनों को सुनकर धैर्य किसको नहीं त्याग देगा (अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा)।