श्रीरामचरित सुनने गाने की महिमा

बालकांड के अंत में श्रीरामचरित के श्रवण और गान की महिमा कही गई है। भक्तिभाव से इस पावन कथा का स्मरण करने वालों को मंगल, शांति और कल्याण प्राप्त होता है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५९ / ५९

प्रकरण पाठ

छन्द

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥ उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥

अर्थ:

अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये तुलसी ने राम का यश कहा है। [नहीं तो] श्रीरघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है, किस कवि ने उसका पार पाया है? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजी की कृपा से सदा सुख पावेंगे॥।

सोरठा

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥ ३६१ ॥

अर्थ:

श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी के विवाह-प्रसंग को जो लोग प्रेमपूर्वक गायें-सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह (आनन्द)-ही-उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी का यश मंगल का धाम है।