सुनु मुनीस बर दरसन तोरें

चौपाई २, दोहा ३४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥ जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥ २ ॥

अर्थ

[उन्होंने कहा—] हे मुनीश्वर! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में ऐसा विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपति चाहते हैं; परन्तु [असंभव समझकर] जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना