मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा

चौपाई १, दोहा ३४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥ सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥ १ ॥

अर्थ

जनकजी ने मुनिमण्डली को सिर नवाया और सभी से आशीर्वाद पाया। फिर आदर के साथ वे रूप, शील और गुणों के निधान सब भाइयों से--अपने दामादों से मिले।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना