सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई
चौपाई १, दोहा ३४२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥ होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥ १ ॥
अर्थ
आपने मुझे सभी प्रकार से बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। यदि दस सहस्र सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पों भर गणना करें।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना