चले निसान बजाइ सुर निज निज
चले निसान बजाइ सुर निज निज
दोहा ३५३ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥ ३५३ ॥
अर्थ
नगाड़े बजाकर और [परम] सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकों को चले। वे एक-दूसरे से श्रीरामजी का यश कहते जाते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का दोहा ३५३ है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना