धूप धूम नभु मेचक भयऊ
धूप धूम नभु मेचक भयऊ
चौपाई १, दोहा ३४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥ सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँबलाक अवलि मनु करषहिं॥ १ ॥
अर्थ
धूप के धुएँ से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़-घुमड़कर छा गये हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलों की पंक्ति मन को अपनी ओर खींच रही हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना