बार बार करि बिनय बड़ाई
बार बार करि बिनय बड़ाई
चौपाई १, दोहा ३४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥ जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥ १ ॥
अर्थ
जनकजी ने बार-बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाइयों के साथ चले। जनकजी ने जाकर विश्वामित्रजी के चरण पकड़ लिये और उनके चरणों की रज सिर और नेत्रों में लगाई।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना