मन समेत जेहि जान न बानी
मन समेत जेहि जान न बानी
चौपाई ४, दोहा ३४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥ महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥ ४ ॥
अर्थ
जिनको मन सहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमा को वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालों में एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना