जोरि पंकरुह पानि सुहाए
जोरि पंकरुह पानि सुहाए
चौपाई २, दोहा ३४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥ राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥ २ ॥
अर्थ
और सुन्दर कमल के समान हाथों को जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेम से ही जन्मे हों। हे रामजी ! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ ! आप मुनियों और महेशजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना