मंगलगान करहिं बर भामिनि
मंगलगान करहिं बर भामिनि
चौपाई १, दोहा ३५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥ अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥ १ ॥
अर्थ
सुन्दर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गयी। सबने आचमन करके पान खाये और फूलों की माला, सुगन्धित द्रव्य आदि से विभूषित होकर सब शोभा से छा गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना