बस्तु अनेक निछावरि होहीं
बस्तु अनेक निछावरि होहीं
चौपाई ३, दोहा ३५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥ पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं॥ ३ ॥
अर्थ
अनेकों वस्तुएँ निछावर हो रही हैं; सभी माताएँ आनन्द से भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगी ने परम तत्त्व को प्राप्त कर लिया। सदा के रोगी ने मानो अमृत पा लिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना