रामहि देखि रजायसु पाई
रामहि देखि रजायसु पाई
चौपाई २, दोहा ३५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥ प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर को चले। वहाँ के प्रेम, आनन्द, विनोद, बड़ाई, समय, समाज और मनोहरता—
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना