भीतर भवन दीन्ह बर बासू
भीतर भवन दीन्ह बर बासू
चौपाई ४, दोहा ३५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृपु रनिवासू॥ पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥ ४ ॥
अर्थ
उन्हें महल के भीतर ठहरने को उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और रनिवास उनका मन जोगवत रह सके। फिर राजा ने गुरु वसिष्ठजी के चरणकमलों की पूजा और विनती की। उनके हृदय में कम प्रीति न थी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना