बालकाण्ड

बालकाण्ड में भगवान राम के जन्म, बचपन, गुरु विश्वामित्र की शिक्षा और शिव धनुष तोड़कर सीता से विवाह का वर्णन है।

मुख्य प्रसंग: राम जन्म · सीता स्वयंवर · शिव धनुष भंग

काण्ड १ · ५९ प्रकरण

छंद संख्या

दोहे
३५९
सोरठा
३६
चौपाइयाँ
१४८४
छन्द
६०
श्लोक

बालकाण्ड के प्रकरण

प्रकरण १ / ५९

मंगलाचरण

तुलसीदासजी मंगलमय आरम्भ में सरस्वती, गणेश, भवानी-शंकर और श्रीराम का स्मरण करते हैं। वे दिव्य कृपा की याचना कर काव्य को शुभ दिशा देते हैं।

प्रकरण २ / ५९

गुरु वन्दना

कवि गुरु के चरणों में प्रणाम कर उन्हें अज्ञान दूर करने वाला करुणामय प्रकाश बताते हैं। गुरु-कृपा से ही रामकथा का सच्चा बोध संभव होता है।

प्रकरण ३ / ५९

ब्राह्मण संत वन्दना

ब्राह्मणों और संतों को धरती पर चलने वाले देवस्वरूप मानकर कवि उनकी महिमा गाते हैं। उनकी कृपा, शील और लोकहितकारी वृत्ति को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया है।

प्रकरण ४ / ५९

खल वन्दना

तुलसीदास खलों को भी वन्दन करते हैं, क्योंकि उनके स्वभाव को जानकर साधक सावधान रहता है। वे अप्रत्यक्ष रूप से उनसे विघ्न न डालने की प्रार्थना भी करते हैं।

प्रकरण ५ / ५९

संत असंत वन्दना

संत और असंत के स्वभाव का सूक्ष्म विवेचन किया गया है। संतों की शीतल, हितकारी वृत्ति और दुष्टों की पीड़ादायक प्रवृत्ति के माध्यम से सद्गुणों का महत्व स्पष्ट होता है।

प्रकरण ६ / ५९

रामरूप से जीवमात्र की वन्दना

कवि समस्त जीवों में राम का ही अंश देखकर सबको प्रणाम करते हैं। यह दृष्टि करुणा, समभाव और ईश्वर की सर्वव्यापकता का बोध कराती है।

प्रकरण ७ / ५९

तुलसीदासजी की दीनता और रामभक्तिमयी कविता की महिमा

तुलसीदासजी अपनी अल्पता और दीनता प्रकट करते हुए स्वीकार करते हैं कि यह कार्य केवल प्रभु-कृपा से संभव है। साथ ही वे रामभक्ति से ओतप्रोत कविता की पवित्रता और लोकमंगलकारी शक्ति का वर्णन करते हैं।

प्रकरण ८ / ५९

कवि वन्दना

कवि पूर्ववर्ती महाकवियों को प्रणाम करते हैं, जिनकी वाणी ने धर्म, भक्ति और रस को समृद्ध किया। उन्हीं की परम्परा में वे विनम्रतापूर्वक अपनी रचना आरम्भ करते हैं।

प्रकरण ९ / ५९

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वन्दना

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव और पार्वती सहित समस्त पूज्य शक्तियों को नमन किया गया है। इस वन्दना से रामकथा को दिव्य परम्परा और आशीर्वाद से जोड़ा गया है।

प्रकरण १० / ५९

श्रीसीताराम धाम परिकर वन्दना

श्रीसीताराम, उनके धाम और उनके सेवक-परिकर को श्रद्धापूर्वक वन्दन किया गया है। यह स्मरण भक्त को प्रभु की करुणा, सान्निध्य और दिव्य लोक से जोड़ता है।

प्रकरण ११ / ५९

श्रीनाम वन्दना और नाम महिमा

रामनाम की महिमा का गान करते हुए बताया गया है कि कलियुग में नाम ही सबसे सहज और कल्याणकारी आश्रय है। नाम स्मरण से भय, पाप और दुःख दूर होकर भक्ति दृढ़ होती है।

प्रकरण १२ / ५९

श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा

श्रीराम के गुण, करुणा और चरित्र की महिमा का वर्णन किया गया है। उनकी कथा को सुनना और गाना जीव के लिए पवित्र, मंगलमय और मुक्तिदायक बताया गया है।

प्रकरण १३ / ५९

मानस निर्माण की तिथि

रामचरितमानस के निर्माण का शुभ समय बताकर कवि इस रचना के आरम्भ को पावन उत्सव के रूप में प्रस्तुत करते हैं। तिथि का उल्लेख काव्य को ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों गरिमा देता है।

प्रकरण १४ / ५९

मानस का रूप और माहात्म्य

मानस को सरोवर के रूपक में समझाते हुए उसके अंग, रस और गूढ़ अर्थों का निरूपण किया गया है। साथ ही उसके पाठ, श्रवण और मनन से होने वाले आध्यात्मिक लाभों का वर्णन है।

प्रकरण १५ / ५९

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

प्रयाग की पवित्र भूमि में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य का संवाद आरम्भ होता है। तीर्थ-माहात्म्य और जिज्ञासा के इस प्रसंग से आगे रामकथा की भूमिका तैयार होती है।

प्रकरण १६ / ५९

सती का भ्रम, श्रीरामजी का ऐश्वर्य और सती का खेद

सती, श्रीरामजी के मानवरूप को देखकर उनके परम ऐश्वर्य पर संशय करती हैं और परीक्षा लेने का प्रयास करती हैं। प्रभु की दिव्यता प्रकट होते ही उन्हें अपनी भूल का गहरा खेद होता है।

प्रकरण १७ / ५९

शिवजी द्वारा सती का त्याग, शिवजी की समाधि

सती के आचरण से शिवजी भीतर से विरक्त हो जाते हैं और उन्हें पत्नीभाव से स्वीकार नहीं करते। इसके बाद वे गहन समाधि में स्थित होकर जगत से मानो अलग हो जाते हैं।

प्रकरण १८ / ५९

सती का दक्ष यज्ञ में जाना

शिवजी की अनुमति न होने पर भी सती पिता दक्ष के यज्ञ में जाने का निश्चय करती हैं। यह यात्रा आगे होने वाले अत्यंत करुण और निर्णायक प्रसंग की भूमिका बनती है।

प्रकरण १९ / ५९

पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस

दक्ष के यज्ञ में शिवजी का अपमान देखकर सती अत्यंत व्यथित हो उठती हैं और योगाग्नि में शरीर त्याग देती हैं। इसके परिणामस्वरूप यज्ञ का विध्वंस होता है और देवसभा शोक व भय से भर उठती है।

प्रकरण २० / ५९

पार्वती का जन्म और तपस्या

सती पुनर्जन्म लेकर हिमवान के घर पार्वती रूप में प्रकट होती हैं। वे शिवजी को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या करती हैं और उनकी अटल निष्ठा समस्त लोकों को चकित करती है।

प्रकरण २१ / ५९

श्रीरामजी का शिवजी से विवाह के लिये अनुरोध

श्रीरामजी शिवजी के समक्ष पार्वती से विवाह करने का अनुरोध रखते हैं, जिससे लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त हो। प्रभु के वचन से शिवजी का संकल्प शुभ दिशा ग्रहण करता है।

प्रकरण २२ / ५९

सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्त्व

सप्तर्षि पार्वतीजी की निष्ठा की परीक्षा लेते हैं और विविध प्रकार से उन्हें विचलित करने का प्रयत्न करते हैं। पार्वतीजी अडिग रहकर अपने प्रेम, विवेक और महानता का परिचय देती हैं।

प्रकरण २३ / ५९

कामदेव का देवकार्य के लिये जाना और भस्म होना

देवताओं के कार्य के लिए कामदेव शिवजी की तपस्या भंग करने जाता है। शिवजी के क्रोध से वह भस्म हो जाता है, और इस घटना से देवसमूह तथा रति दोनों व्याकुल हो उठते हैं।

प्रकरण २४ / ५९

रति को वरदान

रति के विलाप पर उसे आश्वासन और वरदान मिलता है कि कामदेव का कल्याण होगा। इस करुण प्रसंग में ईश्वर की दया और भविष्य की सांत्वना एक साथ प्रकट होती है।

प्रकरण २५ / ५९

देवताओं का शिवजी से ब्याह के लिये प्रार्थना करना, सप्तर्षियों का पार्वती के पास जाना

देवता शिवजी से पार्वतीजी के साथ ब्याह करने की प्रार्थना करते हैं। उधर सप्तर्षि पार्वती के पास जाकर शुभ समाचार और विवाह की दिशा में आगे की व्यवस्था करते हैं।

प्रकरण २६ / ५९

शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी

शिवजी की अलौकिक और विलक्षण बारात हिमवान के नगर की ओर चलती है। उधर पर्वतराज के घर विवाह की मंगल तैयारियाँ होती हैं और देव, ऋषि तथा स्त्रियाँ उस अद्भुत दृश्य से चकित हो उठते हैं।

प्रकरण २७ / ५९

शिवजी का विवाह

विधिपूर्वक शिव और पार्वती का दिव्य विवाह सम्पन्न होता है। देवता, ऋषि और समस्त लोक इस मंगल मिलन का उत्सव मनाते हैं।

प्रकरण २८ / ५९

शिव-पार्वती संवाद

विवाह के बाद पार्वतीजी भगवान श्रीराम के स्वरूप और अवतार का रहस्य पूछती हैं। शिवजी प्रेमपूर्वक रामकथा का आरम्भ करते हुए उनके परम तत्त्व का निरूपण करते हैं।

प्रकरण २९ / ५९

श्रीरामावतार के हेतु

शिवजी पार्वतीजी को बताते हैं कि भक्तों के हित, धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए भगवान अवतार धारण करते हैं। वे विशेष रूप से श्रीरामावतार से जुड़े कारणों का वर्णन करते हैं।

प्रकरण ३० / ५९

नारद का अभिमान और माया का प्रभाव

देवर्षि नारद तप से कामदेव को जीतकर अभिमान से भर उठते हैं। भगवान की माया उन्हें सूक्ष्म रूप से स्पर्श करती है और उनकी परीक्षा का मार्ग तैयार होता है।

प्रकरण ३१ / ५९

विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान को शाप और नारद का मोहभंग

विश्वमोहिनी के स्वयंवर में नारदजी मोहवश अपमान अनुभव करते हैं और क्रोध में शिवगणों तथा स्वयं भगवान को शाप दे बैठते हैं। अंततः उनकी माया दूर होती है और वे लीला का रहस्य समझकर विनम्र हो जाते हैं।

प्रकरण ३२ / ५९

मनु-शतरूपा तप एवं वरदान

मनु और शतरूपा कठोर तप करके भगवान से अपने पुत्र रूप में प्रकट होने का वर माँगते हैं। प्रसन्न होकर भगवान उन्हें वह दिव्य वरदान देते हैं।

प्रकरण ३३ / ५९

प्रतापभानु की कथा

राजा प्रतापभानु छलपूर्वक विपथित होते हैं और ब्राह्मणों के शाप से उनके भाग्य की दिशा बदल जाती है। यही कथा आगे रावण आदि के जन्म की पृष्ठभूमि बनती है।

प्रकरण ३४ / ५९

रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार

शाप के परिणामस्वरूप रावण, कुंभकर्ण, विभीषण आदि का जन्म होता है। तपस्या से वर पाकर रावण महान ऐश्वर्य प्राप्त करता है, पर बाद में अत्याचार से तीनों लोकों को संतप्त करता है।

प्रकरण ३५ / ५९

पृथ्वी और देवतादि की करुण पुकार

रावण के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी गौ के रूप में विलाप करती है। देवता भी ब्रह्मा के साथ मिलकर भगवान से रक्षा की करुण प्रार्थना करते हैं।

प्रकरण ३६ / ५९

भगवान का वरदान

देवताओं की विनती सुनकर भगवान आश्वासन देते हैं कि वे रघुकुल में अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे। यह वचन सुनकर सबके हृदय में शांति और आशा जाग उठती है।

प्रकरण ३७ / ५९

राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना

संतान की कामना से राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कराते हैं। यज्ञफल स्वरूप प्राप्त पायस ग्रहण करने के बाद उनकी रानियाँ गर्भवती होती हैं।

प्रकरण ३८ / ५९

श्रीभगवान का प्राकट्य और बाललीला का आनंद

अयोध्या में भगवान श्रीराम का मंगलमय प्राकट्य होता है और नगर आनंद से भर उठता है। बाललीलाओं से माता-पिता, परिजन और भक्तजन निरंतर हर्षित होते हैं।

प्रकरण ३९ / ५९

विश्वामित्र का राजा दशरथ से राम-लक्ष्मण को माँगना

ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आकर अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ पहले संकोच करते हैं, पर गुरु वशिष्ठ की सम्मति से दोनों कुमार उनके साथ जाते हैं।

प्रकरण ४० / ५९

विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा

राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ वन में जाकर ताड़का का वध करते हैं और यज्ञ की रक्षा करते हैं। वे मारीच और सुबाहु को परास्त कर ऋषियों को निर्भय कर देते हैं।

प्रकरण ४१ / ५९

अहल्या उद्धार

श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या का शाप दूर होता है और वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करती हैं। गौतम ऋषि के आश्रम में यह करुणा की अद्भुत लीला सबको भावविभोर कर देती है।

प्रकरण ४२ / ५९

श्रीराम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश

विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर जनकपुर पहुँचते हैं। मिथिला की पावन भूमि पर उनके आगमन से नगर में कौतूहल और आनंद फैल जाता है।

प्रकरण ४३ / ५९

श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेममुग्धता

जनकजी जब श्रीराम और लक्ष्मण के मनोहर रूप को देखते हैं, तो प्रेम में मग्न हो जाते हैं। उनके हृदय में दिव्य आकर्षण और आदर उमड़ पड़ता है।

प्रकरण ४४ / ५९

श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण

गुरु की आज्ञा से श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुर का भ्रमण करते हैं। नगरवासी उनके रूप, विनय और तेज को देखकर मुग्ध हो उठते हैं।

प्रकरण ४५ / ५९

पुष्पवाटिका निरीक्षण, सीताजी का प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजी का परस्पर दर्शन

श्रीराम पुष्पवाटिका देखने जाते हैं, जहाँ सीताजी का प्रथम दर्शन होता है। उस पावन क्षण में श्रीसीतारामजी एक-दूसरे को देखकर अंतःकरण से आकृष्ट होते हैं।

प्रकरण ४६ / ५९

श्रीसीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदानप्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण संवाद

सीताजी पार्वतीजी का पूजन कर मनोवांछित वर की प्रार्थना करती हैं और उन्हें मंगलमय आश्वासन मिलता है। उधर राम और लक्ष्मण के बीच जनकपुर और स्वयंवर को लेकर सुंदर संवाद होता है।

प्रकरण ४७ / ५९

श्रीराम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश

विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर यज्ञशाला की विशाल सभा में प्रवेश करते हैं। वहाँ एकत्र राजाओं, मुनियों और जनसमूह की दृष्टि उन पर ठहर जाती है।

प्रकरण ४८ / ५९

श्रीसीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश

सीताजी सखियों सहित यज्ञशाला में प्रवेश करती हैं। सभा में उपस्थित सभी जन उनके सौंदर्य, लज्जा और तेज से अभिभूत हो उठते हैं।

प्रकरण ४९ / ५९

बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा

बंदीजन सभा में जनक की प्रतिज्ञा का उद्घोष करते हैं कि जो वीर शिवधनुष उठाकर चढ़ाएगा, वही सीता का वरण करेगा। यह सुनकर राजाओं का उत्साह और प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।

प्रकरण ५० / ५९

राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशाजनक वाणी

अनेक बलवान राजा प्रयास करने पर भी शिवधनुष को हिला तक नहीं पाते। इससे जनकजी खिन्न होकर ऐसी वाणी कहते हैं, जिसे सुनकर सभा स्तब्ध रह जाती है।

प्रकरण ५१ / ५९

श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध

राजा जनक के वचन सुनकर श्रीलक्ष्मणजी का वीर रस उमड़ पड़ता है। वे रघुवंश की महिमा प्रकट करते हुए सभा में अपना धर्मयुक्त रोष व्यक्त करते हैं।

प्रकरण ५२ / ५९

धनुषभंग

विश्वामित्रजी की आज्ञा से श्रीरामजी सहज भाव से शिवजी का धनुष उठाते हैं। प्रत्यंचा चढ़ाते ही वह धनुष भंग हो जाता है और सभा आश्चर्य तथा हर्ष से भर उठती है।

प्रकरण ५३ / ५९

जयमाल पहनाना

धनुषभंग के बाद जनकनंदिनी सीताजी लज्जा और आनंद से भरकर श्रीरामजी के गले में जयमाल पहनाती हैं। देवता पुष्पवर्षा करते हैं और मंगलध्वनि गूंज उठती है।

प्रकरण ५४ / ५९

श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद

धनुषभंग का समाचार पाकर परशुरामजी क्रोध सहित सभा में आते हैं। श्रीरामजी की विनय और श्रीलक्ष्मणजी के तीखे वचनों के बीच संवाद होता है, अंत में परशुरामजी श्रीरामजी का दिव्य स्वरूप पहचानकर शांत हो जाते हैं।

प्रकरण ५५ / ५९

दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान

राजा जनक विवाह का शुभ समाचार अयोध्या भेजते हैं। संदेश पाकर महाराज दशरथ हर्षित होते हैं और समस्त राजपरिवार तथा बारात के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं।

प्रकरण ५६ / ५९

बारात का जनकपुर में आना और स्वागतादि

अयोध्या की बारात जनकपुर पहुँचती है, जहाँ उसका अत्यंत आदर और उत्साह से स्वागत होता है। नगर मंगलमय हो उठता है और दोनों कुलों का मिलन आनंद से भर जाता है।

प्रकरण ५७ / ५९

श्रीसीता-राम विवाह

विधिपूर्वक श्रीसीता-राम विवाह संपन्न होता है और साथ ही अन्य राजकुमारों के विवाह भी मंगलमय रीति से सम्पन्न होते हैं। वैदिक मंत्रों, देवों की प्रसन्नता और लोकानंद से जनकपुर पवित्र उत्सव में डूब जाता है।

प्रकरण ५८ / ५९

बारात का अयोध्या लौटना और अयोध्या में आनन्द

विवाह के उपरांत बारात नववधुओं सहित अयोध्या लौटती है। नगरवासी प्रेम और उल्लास से उनका स्वागत करते हैं, और अयोध्या आनंदमय हो उठती है।

प्रकरण ५९ / ५९

श्रीरामचरित सुनने गाने की महिमा

बालकांड के अंत में श्रीरामचरित के श्रवण और गान की महिमा कही गई है। भक्तिभाव से इस पावन कथा का स्मरण करने वालों को मंगल, शांति और कल्याण प्राप्त होता है।