मुनितिय तरी लगत पग धूरी
मुनितिय तरी लगत पग धूरी
चौपाई २, दोहा ३५७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥ कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥ २ ॥
अर्थ
चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गयी। विश्व भर में यह कीर्ति पूर्ण रीति से व्याप्त हो गयी। कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना