सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी
चौपाई ३, दोहा ३४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥ कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥ ३ ॥
अर्थ
हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियाँ आपके दर्शन की अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलने वाली हैं। इस प्रकार बार-बार विनती की और सिर नवाकर तथा आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना