धूप दीप नैबेद बेद बिधि
धूप दीप नैबेद बेद बिधि
चौपाई २, दोहा ३५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥ बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥ २ ॥
अर्थ
फिर वेद की विधि के अनुसार मंगलनिधि दूलह और दुलहिनों की धूप, दीप और नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा की। माताएँ बारंबार आरती कर रही हैं और वर-वधुओं के सिरों पर सुन्दर पंखे तथा चँवर ढल रहे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना