दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा

चौपाई ३, दोहा ३४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥ सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥ ३ ॥

अर्थ

नगाड़ों की ध्वनि मानो बादलों की घोर गर्जना है। याचकगण पपीहे, मेढक और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।

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बारात का अयोध्या लौटना